“भारत जैसे बहुसांस्कृतिक समाज में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) लागू करना कितना व्यावहारिक है? संवैधानिक एवं सामाजिक दृष्टिकोण से चर्चा कीजिए।”

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डेली मेन्स आंसर राइटिंग प्रैक्टिस (UPSC/BPSC 2026)
मुख्य परीक्षा प्रश्न (Mains Question):

“भारत जैसे बहुसांस्कृतिक समाज में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) लागू करना कितना व्यावहारिक है? संवैधानिक एवं सामाजिक दृष्टिकोण से चर्चा कीजिए।”

(अंक: 15 / शब्द संख्या: 250) - सामान्य अध्ययन पेपर-2 (राजव्यवस्था एवं शासन)

आदर्श उत्तर (Model Answer)

1. प्रस्तावना (Introduction):

समान नागरिक संहिता (UCC) का तात्पर्य सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार एवं गोद लेने जैसे वैयक्तिक (personal) मामलों में एक समान कानून लागू करने से है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 (राज्य के नीति निदेशक तत्व - DPSP) में राज्य को इसे क्रमिक रूप से लागू करने का निर्देश दिया गया है। वर्तमान में, भारत की बहुसांस्कृतिक (multicultural) और धार्मिक विविधता इसके व्यावहारिक क्रियान्वयन को अत्यंत जटिल किंतु विचारणीय बनाती है।

समान नागरिक संहिता (UCC) का वैचारिक द्वंद्व (Flowchart)
संवैधानिक आदर्श
समानता (अनु. 14) → लैंगिक न्याय → राष्ट्रीय एकीकरण
VS
व्यावहारिक चुनौतियाँ
धार्मिक स्वतंत्रता (अनु. 25) → सांस्कृतिक विविधता → सामाजिक प्रतिरोध

2. संवैधानिक दृष्टिकोण (Constitutional Perspective):

(A) UCC के पक्ष में संवैधानिक आधार:

  • विधि के समक्ष समानता (अनुच्छेद 14) एवं भेदभाव का निषेध (अनुच्छेद 15): वैयक्तिक कानूनों में मौजूद विसंगतियां महिलाओं के मौलिक अधिकारों का हनन करती हैं। UCC इन अधिकारों को सुदृढ़ कर Gender Justice (लैंगिक न्याय) सुनिश्चित करता है।
  • Constitutional Morality (संवैधानिक नैतिकता): यह पंथनिरपेक्षता (Secularism) के उस मूल ढांचे को बढ़ावा देता है जहाँ राज्य का कानून किसी धर्म विशेष से संचालित नहीं होता।
  • न्यायिक अधिघोषणाएं (Judicial Pronouncements): सर्वोच्च न्यायालय ने शाह बानो मामला (1985), सरला मुद्गल मामला (1995) और शायरा बानो मामला (2017) में स्पष्ट किया है कि वैयक्तिक कानूनों में सुधार राष्ट्रीय अखंडता और समानता के लिए आवश्यक है।

(B) संवैधानिक चुनौतियाँ:

  • धार्मिक एवं सांस्कृतिक अधिकार (अनुच्छेद 25 और 29): आलोचकों का तर्क है कि वैयक्तिक कानूनों की स्वायत्तता धार्मिक स्वतंत्रता का हिस्सा है, जिससे अल्पसंख्यक समुदायों में असुरक्षा की भावना (Minority apprehensions) उत्पन्न होती है।
  • संवैधानिक संतुलन: वास्तविक विश्लेषणात्मक चुनौती मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) और नीति निदेशक तत्वों (DPSP) के बीच एक सामंजस्यपूर्ण संतुलन स्थापित करने की है।

3. सामाजिक दृष्टिकोण (Social Perspective):

(A) सुगमता एवं व्यावहारिकता के कारक:

आधुनिकीकरण, बढ़ते नगरीकरण (Urbanization) और सामाजिक गतिशीलता के कारण रूढ़िवादी प्रथाओं में कमी आई है। तीन तलाक की समाप्ति जैसे सुधारों ने यह सिद्ध किया है कि समाज समतावादी कानूनों को स्वीकार करने के लिए तैयार हो रहा है, जो एक समान नागरिक पहचान (National Integration) के निर्माण में सहायक है।

(B) व्यावहारिक कठिनाइयाँ:

भारत में व्यापक धार्मिक विविधता और विभिन्न जनजातीय प्रथाएं (Tribal customs) मौजूद हैं, जिन्हें संविधान की छठी अनुसूची के तहत विशेष संरक्षण प्राप्त है। इसके अतिरिक्त, राजनीतिक ध्रुवीकरण (Political polarization) और सूचनाओं के अभाव के कारण उत्पन्न अविश्वास (Trust deficit) समाज में तीव्र प्रतिरोध पैदा करता है।

"वास्तविक चुनौती भारत में 'कानूनी एकरूपता (Legal Uniformity)' और 'सांस्कृतिक बहुलता (Cultural Plurality)' के बीच संतुलन स्थापित करने की है।"

4. उदाहरण आधारित विमर्श (Example Based Discussion):

भारत में ही **गोवा सिविल कोड (Goa Civil Code)** इसका एक सफल उदाहरण है, जहाँ पुर्तगाली नागरिक संहिता (1867) के माध्यम से सभी धर्मों के लिए समान कानून लागू हैं, जिससे सामाजिक समरसता प्रभावित नहीं हुई है। यह दर्शाता है कि स्थानीय स्तर पर अनुकूलन के साथ समान कानून व्यावहारिक रूप से संभव हैं।

5. आगे की राह (Way Forward):

  • आम सहमति का निर्माण (Consensus Building): जैसा कि 21वें विधि आयोग (Law Commission) ने सुझाव दिया था, सुधारों को थोपने के बजाय सभी हितधारकों के साथ व्यापक संवाद और जागरूकता अभियान (Dialogue & Awareness) चलाया जाना चाहिए।
  • चरणबद्ध क्रियान्वयन (Gradual Implementation): प्रथम चरण में सभी वैयक्तिक कानूनों का संहितीकरण (Codification of personal laws) कर उनमें मौजूद लैंगिक-विभेदों को समाप्त किया जाना चाहिए।
  • मूलमंत्र: समाज में सुधार का मार्ग “Reform through consultation, not imposition” (थोपकर नहीं, बल्कि परामर्श के माध्यम से सुधार) होना चाहिए।

6. निष्कर्ष (Conclusion):

निष्कर्षतः, भारत में समान नागरिक संहिता का अंतिम उद्देश्य केवल कानूनी एकरूपता लाना नहीं, बल्कि "समरूपता के बिना एकता" (Unity without uniformity) के आदर्श को जीवित रखते हुए एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना करना होना चाहिए। अतः इसे सामाजिक संवेदनशीलता, संवैधानिक मूल्यों और क्रमिक लोकतांत्रिक सहमति के साथ चरणबद्ध तरीके से लागू करना ही सबसे व्यावहारिक मार्ग होगा।


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Q1. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 मौलिक अधिकारों से किस प्रकार भिन्न है?

अनुच्छेद 44 राज्य के नीति निदेशक तत्वों (DPSP) के अंतर्गत आता है, जो न्यायालय द्वारा गैर-प्रवर्तनीय (non-enforceable) हैं, यानी इन्हें लागू करने के लिए सरकार पर कानूनी दबाव नहीं डाला जा सकता। इसके विपरीत, अनुच्छेद 14, 15 और 25 मौलिक अधिकार हैं, जो न्यायालय द्वारा पूर्णतः प्रवर्तनीय (justiciable) हैं।

Q2. 21वें विधि आयोग (Law Commission) ने UCC पर क्या महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी?

21वें विधि आयोग ने वर्ष 2018 के अपने परामर्श पत्र में कहा था कि इस चरण में एक समान नागरिक संहिता "न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय"। आयोग ने इसके स्थान पर विभिन्न वैयक्तिक कानूनों के भीतर मौजूद लैंगिक असमानताओं और भेदभावपूर्ण प्रथाओं को पहले संशोधित करने की सिफारिश की थी।

Q3. गोवा नागरिक संहिता (Goa Civil Code) की मुख्य विशेषताएं क्या हैं?

गोवा भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ पुर्तगाली नागरिक संहिता लागू है। इसके तहत सभी धर्मों के लोगों के लिए विवाह का अनिवार्य पंजीकरण, विवाह के दौरान संपत्ति पर पति-पत्नी का समान अधिकार (Communion of Property) और वसीयत के बिना मृत्यु होने पर बेटियों को संपत्ति में समान अधिकार जैसे प्रगतिशील प्रावधान शामिल हैं।

📌 Aspirants Note: इस उत्तर में उपयोग किए गए कीवर्ड्स जैसे Constitutional Morality, Gender Justice, और Pluralism को अपने शार्ट नोट्स में जरूर शामिल करें।
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