भूमिका (Introduction)
हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा देश में उच्च प्रदर्शन वाले जैव-विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए BioE3 (Biotechnology for Economy, Employment and Environment) नीति को मंजूरी दी गई है। यह नीति भारत को पारंपरिक 'जीवाषम-आधारित उपभोग अर्थव्यवस्था' (Fossil-based economy) से हटाकर एक सतत जैव-अर्थव्यवस्था (Sustainable Bio-economy) और 'नेट-जीरो' उत्सर्जन लक्ष्यों की ओर ले जाने में एक महत्वपूर्ण उत्प्रेरक (Catalyst) के रूप में कार्य करेगी। वैश्विक जैव-अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी को वर्तमान से बढ़ाकर वर्ष 2030 तक 300 बिलियन डॉलर करने का लक्ष्य इस नीति के मूल में है।
मुख्य भाग (Main Body)
1. सतत जैव-अर्थव्यवस्था में परिवर्तन के लिए 'उत्प्रेरक' के रूप में BioE3 नीति
यह नीति निम्नलिखित रणनीतिक स्तंभों के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था को जीवाश्म-आधारित मॉडल से हरित मॉडल में बदलने की क्षमता रखती है:
- उच्च प्रदर्शन वाले जैव-विनिर्माण (High-Performance Biomanufacturing): यह नीति उन्नत दवाओं, बायो-प्लास्टिक, बायो-फ्यूल (जैव-ईंधन) और एंजाइमों के उत्पादन के लिए जैविक प्रणालियों के उपयोग पर ध्यान केंद्रित करती है, जिससे कच्चे तेल और जीवाश्म संसाधनों पर आयात निर्भरता कम होगी।
- रोजगार सृजन और नवाचार (Employment & Innovation): इसके तहत देश में 'बायो-एआई हब' (Bio-AI Hubs) और जैव-विनिर्माण परिसरों की स्थापना की जाएगी। इससे टियर-II और टियर-III शहरों में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और विनिर्माण क्षेत्र में बड़े पैमाने पर कुशल रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
- पर्यावरणीय संधारणीयता (Environmental Sustainability): कार्बन-गहन उद्योगों को कम-कार्बन वाले जैव-आधारित विकल्पों से प्रतिस्थापित करके यह नीति जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और समावेशी एवं सतत विकास (Sustainable Development) को गति देने में सहायक होगी।
- छह रणनीतिक प्राथमिकता वाले क्षेत्र: यह नीति मुख्य रूप से छह क्षेत्रों पर केंद्रित है— जैव-आधारित रसायन और एंजाइम, कार्यात्मक खाद्य पदार्थ और स्मार्ट प्रोटीन, सटीक चिकित्सा (Precision Medicine), जलवायु-अनुकूल कृषि, भविष्य के समुद्री संसाधन, और कार्बन कैप्चर एवं उसका उपयोग।
2. प्रभावी कार्यान्वयन (Implementation) में मुख्य चुनौतियाँ
नीति के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को प्राप्त करने की राह में कुछ संरचनात्मक और तकनीकी बाधाएं निम्नलिखित हैं:
- अनुसंधान और विकास (R&D) में कम निवेश: भारत का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का R&D पर खर्च वर्तमान में लगभग 0.64% है, जो विकसित देशों (जैसे यूएसए, दक्षिण कोरिया) की तुलना में काफी कम है। निजी क्षेत्र की भागीदारी का कम होना भी एक बड़ी चुनौती है।
- लैब-टू-मार्केट (Lab-to-Market) संक्रमण का अभाव: प्रयोगशाला स्तर पर विकसित की गई जैव-तकनीकी खोजों को व्यावसायिक स्तर (Commercial Scale) पर बड़े पैमाने पर उत्पादित करने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे (जैसे- बड़े बायो-रिएक्टर) की भारी कमी है।
- जटिल नियामक प्रक्रियाएं (Regulatory Bottlenecks): आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों (GMOs) और जैव-उत्पादों के लिए भारत में नियामक मंजूरी की प्रक्रिया (जैसे GEAC की मंजूरियां) अत्यंत समय लेने वाली और जटिल है, जिससे नवाचारों के बाजार में आने में देरी होती है।
- कच्चे माल (Biomass) की सतत आपूर्ति शृंखला: जैव-रिफाइनरियों और जैव-विनिर्माण इकाइयों के लिए कृषि-अपशिष्ट और अन्य बायोमास की निर्बाध और किफायती आपूर्ति शृंखला (Supply Chain) स्थापित करना एक बड़ी लॉजिस्टिक चुनौती है।
बिहार अपनी विशाल कृषि-विविधता और प्रचुर बायोमास (जैसे धान की भूसी, गन्ने की खोई और मक्का अपशिष्ट) के कारण BioE3 नीति का लाभ उठाने के लिए एक आदर्श राज्य है। बिहार सरकार की 'बिहार एथेनॉल उत्पादन संवर्धन नीति' पहले से ही इस दिशा में काम कर रही है। BioE3 नीति के तहत यदि राज्य में 'सटीक कृषि' (Climate-Resilient Agriculture) और कृषि-अपशिष्ट आधारित बायो-रिफाइनरियों को बढ़ावा दिया जाए, तो यह न केवल बाढ़ और सूखे से प्रभावित बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करेगा, बल्कि बड़े पैमाने पर स्थानीय रोजगार का सृजन कर मानव पूंजी के पलायन (Migration) को भी रोकेगा।
प्रशासनिक दृष्टिकोण और रचनात्मक सुझाव (Way Forward)
BioE3 नीति के सफल और प्रभावी क्रियान्वयन के लिए एक प्रशासनिक स्तर पर निम्नलिखित सुधारात्मक कदम उठाए जाने चाहिए:
- सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP Model) को प्रोत्साहन: अनुसंधान को गति देने के लिए 'अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन' (Anusandhan NRF) के माध्यम से निजी निवेश को आकर्षित किया जाना चाहिए और टैक्स में छूट दी जानी चाहिए।
- नियामक सरलीकरण (Regulatory Easing): जैव-सुरक्षा मानकों से समझौता किए बिना एकल खिड़की मंजूरी (Single Window Clearance) प्रणाली के माध्यम से नियामक प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित और तीव्र किया जाना चाहिए।
- जैव-विनिर्माण क्लस्टर का विकास: देश के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों (विशेषकर बिहार जैसे कृषि-प्रधान राज्यों में) कच्चे माल की उपलब्धता के आधार पर विशिष्ट जैव-विनिर्माण क्लस्टर (Biomanufacturing Hubs) विकसित किए जाने चाहिए।
निष्कर्ष (Conclusion)
संक्षेप में, BioE3 नीति भारत को 21वीं सदी की 'हरित औद्योगिक क्रांति' के नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक प्रगतिशील और भविष्यवादी कदम है। यद्यपि बुनियादी ढांचे और नियामक स्तर पर कुछ चुनौतियां विद्यमान हैं, परंतु यदि सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को बढ़ावा देते हुए राज्यों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाए, तो यह नीति भारत के आर्थिक विकास (जैव-अर्थव्यवस्था), रोजगार और पर्यावरण संरक्षण के त्रिकोण को सफलतापूर्वक सुदृढ़ कर सकेगी।
प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न (10 महत्वपूर्ण MCQs व्याख्या सहित)
इस विषय से जुड़े आगामी प्रारंभिक परीक्षा (PT) के संभावित प्रश्न और उनकी विस्तृत व्याख्या नीचे दी गई है:
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हाल ही में चर्चा में रही 'BioE3' नीति का पूर्ण रूप (Full Form) क्या है?उत्तर: (B)
व्याख्या: BioE3 नीति का पूरा नाम 'Biotechnology for Economy, Employment and Environment' (अर्थव्यवस्था, रोजगार और पर्यावरण के लिए जैव प्रौद्योगिकी) है। इसे केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा उच्च प्रदर्शन वाले जैव-विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए मंजूरी दी गई है। -
BioE3 नीति के तहत भारत ने किस वर्ष तक अपनी जैव-अर्थव्यवस्था (Bio-economy) को 300 बिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है?उत्तर: (B)
व्याख्या: भारत सरकार ने BioE3 नीति के प्रभावी कार्यान्वयन के माध्यम से वर्ष 2030 तक भारतीय जैव-अर्थव्यवस्था का आकार 300 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक बढ़ाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। -
BioE3 नीति के क्रियान्वयन के लिए भारत सरकार का कौन सा मंत्रालय/विभाग नोडल एजेंसी के रूप में कार्य कर रहा है?उत्तर: (B)
व्याख्या: विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत आने वाला जैव प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Biotechnology - DBT) इस नीति को लागू करने और इसकी निगरानी करने के लिए मुख्य नोडल विभाग है। -
BioE3 नीति के अंतर्गत निम्नलिखित में से कौन सा क्षेत्र इसके 'छह रणनीतिक प्राथमिकता वाले क्षेत्रों' में शामिल नहीं है?उत्तर: (C)
व्याख्या: इस नीति में छह प्राथमिकता वाले क्षेत्र तय किए गए हैं: 1. जैव-आधारित रसायन, 2. स्मार्ट प्रोटीन, 3. सटीक चिकित्सा, 4. जलवायु-अनुकूल कृषि, 5. भविष्य के समुद्री संसाधन, और 6. कार्बन कैप्चर। परमाणु ऊर्जा जैव-प्रौद्योगिकी का हिस्सा नहीं है, अतः यह शामिल नहीं है। -
नीति के तहत नवाचार को एकीकृत करने के लिए निम्नलिखित में से किस हब (Hubs) की स्थापना का प्रस्ताव है?उत्तर: (A)
व्याख्या: BioE3 नीति में जैविक अनुसंधान और विनिर्माण के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को जोड़ने के लिए देश भर में 'बायो-एआई हब्स' (Bio-AI Hubs) स्थापित करने का विशेष प्रावधान किया गया है। -
वर्तमान में भारत का अनुसंधान और विकास (R&D) पर खर्च उसके सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग कितना प्रतिशत है?उत्तर: (C)
व्याख्या: आर्थिक समीक्षा और नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, भारत का R&D पर कुल खर्च सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 0.64% है, जो नीति के क्रियान्वयन में निवेश की कमी के रूप में एक बड़ी चुनौती है। -
भारत में आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों (GMOs) और जैव-उत्पादों के विनियामक अनुमोदन के लिए उत्तरदायी शीर्ष संस्था कौन सी है?उत्तर: (B)
व्याख्या: पर्यावरण मंत्रालय के तहत कार्य करने वाली 'आनुवंशिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति' (Genetic Engineering Appraisal Committee - GEAC) भारत में पर्यावरण में GMOs के अनुप्रयोगों की अनुमति देने वाली शीर्ष संस्था है। -
बिहार सरकार की कौन सी नीति BioE3 नीति के 'जैव-ईंधन और जैव-रिफाइनरी' के उद्देश्यों के साथ सीधे तौर पर मेल खाती है?उत्तर: (B)
व्याख्या: बिहार एथेनॉल उत्पादन संवर्धन नीति 2021 के तहत राज्य में गन्ने, मक्का और क्षतिग्रस्त अनाजों से एथेनॉल (बायो-फ्यूल) उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है, जो BioE3 के सतत जैव-अर्थव्यवस्था के लक्ष्यों के बिल्कुल अनुकूल है। -
भारत सरकार ने किस वर्ष तक 'नेट-जीरो' (Net-Zero) कार्बन उत्सर्जन का राष्ट्रीय लक्ष्य निर्धारित किया है?उत्तर: (D)
व्याख्या: COP-26 (ग्लासगो) में भारत ने वर्ष 2070 तक शुद्ध शून्य (Net-Zero) कार्बन उत्सर्जन प्राप्त करने की घोषणा की थी। BioE3 नीति इसी जीवाश्म-मुक्त लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में एक कदम है। -
BioE3 नीति का मुख्य सामाजिक-आर्थिक उद्देश्य क्या है?उत्तर: (B)
व्याख्या: इस नीति का एक मुख्य उद्देश्य बड़े शहरों से हटकर देश के छोटे शहरों (टियर-II और टियर-III) में जैव-विनिर्माण हब स्थापित करना है, ताकि ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में कुशल रोजगार (Employment) पैदा हो सके और क्षेत्रीय असंतुलन कम हो।

