“दिल्ली सहित भारत के विभिन्न शहरों में बार-बार होने वाली अग्नि दुर्घटनाएँ शहरी प्रशासन एवं आपदा प्रबंधन की कमियों को उजागर करती हैं। शहरी अग्नि सुरक्षा व्यवस्था की चुनौतियों तथा आवश्यक सुधारों पर चर्चा कीजिए।”
(अंक: 15 / शब्द संख्या: 250) - GS Paper-3 (Disaster Management & Urban Infra)1. प्रस्तावना (Introduction):
भारत में तीव्र और अनियोजित शहरीकरण ने महानगरों को 'मैन-मेड' आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना दिया है, जिसमें शहरी अग्नि (Urban Fire) एक प्रमुख विभीषिका है। दिल्ली, मुंबई और सूरत जैसे बड़े शहरों में वाणिज्यिक भवनों, गेमिंग ज़ोन और कोचिंग सेंटरों में होने वाले बार-बार के अग्निकांड केवल दुर्घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि यह हमारे शहरी प्रशासन (Urban Governance) और आपदा शमन तंत्र (Disaster Mitigation System) की गंभीर विफलता को दर्शाती हैं।
2. शहरी अग्नि सुरक्षा व्यवस्था की मुख्य चुनौतियाँ (Key Challenges):
- भवन उपनियमों और NBC का उल्लंघन: अधिकांश बहुमंज़िला भवनों का निर्माण **राष्ट्रीय भवन संहिता (National Building Code - NBC 2016)** के दिशा-निर्देशों को ताक पर रखकर किया जाता है। आपातकालीन निकास द्वारों (Emergency Exits) का बंद होना या उनकी चौड़ाई कम होना आपदा के समय मौत का मुख्य कारण बनता है।
- जटिल शहरी भूगोल और संकरी गलियाँ: पुराने और घने बसे शहरी क्षेत्रों (जैसे पुरानी दिल्ली) की गलियाँ इतनी संकरी हैं कि आग लगने की स्थिति में दमकल की गाड़ियों (Fire Tenders) का घटना स्थल तक पहुँचना लगभग असंभव हो जाता है।
- नियामक ढिलाई और भ्रष्टाचार: स्थानीय निकायों (Municipal Corporations) द्वारा बिना उचित भौतिक सत्यापन के भवनों को अग्नि अनापत्ति प्रमाण पत्र (Fire NOC) जारी कर देना और व्यावसायिक परिसरों में अवैध रूप से ज्वलनशील पदार्थों का भंडारण होने देना एक बड़ी विधिक चुनौती है।
- संसाधनों और जनशक्ति का अभाव: भारतीय दमकल सेवाओं में आधुनिक उपकरणों (जैसे हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म, थर्मल इमेजर) की भारी कमी है, साथ ही राष्ट्रीय मानकों की तुलना में अग्निशमन कर्मियों के स्वीकृत पदों में भारी रिक्तियाँ हैं।
🚨 आपदा प्रबंधन तंत्र में संरचनात्मक कमियाँ (Structural Gaps)
- प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण (Reactive Approach): हमारा तंत्र आज भी 'आपदा शमन' (Mitigation) और 'पूर्व-तैयारी' (Preparedness) के बजाय आग लगने के बाद 'राहत और बचाव' (Response) पर अधिक ध्यान केंद्रित करता है।
- 'इलेक्ट्रिकल ऑडिट' की उपेक्षा: शहरी क्षेत्रों में लगभग 70-80% आग के हादसों का मूल कारण **'शॉर्ट सर्किट'** होता है, लेकिन कमर्शियल भवनों में नियमित इलेक्ट्रिकल सेफ्टी ऑडिट कराने का कोई बाध्यकारी तंत्र मौजूद नहीं है।
3. आवश्यक सुधारात्मक उपाय (Required Reforms):
- कठोर प्रवर्तन और विधिक उत्तरदायित्व: बिना वैलिड Fire NOC वाले व्यावसायिक और आवासीय परिसरों को तुरंत सील किया जाना चाहिए। विफलता की स्थिति में संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही (Criminal Liability) तय की जाए।
- प्रौद्योगिकी का उपयोग (Smart Fire Fighting): घने शहरी क्षेत्रों में आग पर काबू पाने के लिए ड्रोन, रिमोट-नियंत्रित रोबोट और संकरी गलियों के लिए 'अग्निशमन मोटरबाइक' (Fire Bikes) का उपयोग बढ़ाया जाना चाहिए। भवनों में IoT आधारित स्मार्ट स्मोक डिटेक्टर अनिवार्य हों।
- प्रशासनिक सुधार (2nd ARC का दृष्टिकोण): द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) ने अपनी **5वीं रिपोर्ट (लोक व्यवस्था)** और **6वीं रिपोर्ट (स्थानीय शासन)** में नागरिक सुरक्षा (Civil Defence) और स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन में 'प्रथम अनुक्रियाकर्ता' (First Responders) के रूप में प्रशिक्षित करने की सिफारिश की है। दमकल सेवाओं को पूरी तरह स्थानीय निकायों के अधीन लाकर उन्हें वित्तीय स्वायत्तता दी जानी चाहिए।
- नियमित मॉक ड्रिल और जागरूकता: स्कूलों, कोचिंग संस्थानों और बहुमंज़िला सोसायटियों में अनिवार्य रूप से त्रैमासिक आपदा मॉक ड्रिल आयोजित की जाए ताकि नागरिक आपातकाल के समय पैनिक (Panic) होने से बच सकें।
4. निष्कर्ष (Conclusion):
निष्कर्षतः, शहरी अग्नि सुरक्षा केवल तकनीकी इंजीनियरिंग का विषय नहीं है, बल्कि यह सुशासन (Good Governance) का एक बुनियादी पैमाना है। भारत को यदि वैश्विक स्तर के **'स्मार्ट और सतत शहर'** विकसित करने हैं, तो विकास की अंधी दौड़ के बीच सुरक्षा मानकों से समझौता बंद करना होगा। NDMA के दिशा-निर्देशों को धरातल पर उतारकर ही हम अपने शहरों को सुरक्षित और रहने योग्य बना सकते हैं।
🔍 People Also Ask / शहरी सुरक्षा एवं आपदा प्रबंधन मुख्य तथ्य
Q1. राष्ट्रीय भवन संहिता (National Building Code - NBC) क्या है?
राष्ट्रीय भवन संहिता (NBC) भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा जारी एक व्यापक राष्ट्रीय मार्गदर्शिका है। यह देश भर में भवनों के निर्माण, संरचनात्मक सुरक्षा, अग्नि सुरक्षा व्यवस्था (जैसे निकास द्वार, वेंटिलेशन और फायर फाइटिंग इंस्टॉलेशन) के नियम और कड़े मानक निर्धारित करती है।
Q2. भारत में दमकल सेवा (Fire Services) किस सूची के अंतर्गत आती है?
भारतीय संविधान के तहत दامات/अग्निशमन सेवाएं **राज्य सूची (State List)** के अंतर्गत **7वीं अनुसूची** का विषय हैं। इसके अलावा, संविधान के **12वें संशोधन (12th Schedule - Article 243W)** के तहत इसे शहरी स्थानीय निकायों (Municipalities) के प्रमुख 18 कार्यों में शामिल किया गया है।
“वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा अभियानों की सफलता के बाद अब समावेशी विकास सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। नक्सलवाद के बाद के विकास मॉडल का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।”
(अंक: 15 / शब्द संख्या: 250) - GS Paper-3 (Internal Security & Linkages of Development with Extremism)1. प्रस्तावना (Introduction):
सुरक्षा बलों के कड़े अभियानों और 'SAMADHAN' रणनीति के कारण भारत में वामपंथी उग्रवाद (LWE) का भौगोलिक प्रभाव तेजी से सिकुड़ा है। हालांकि, केवल 'सुरक्षा-केंद्रित जीत' उग्रवाद का स्थायी समाधान नहीं है। नक्सलवाद के प्रभाव के कम होने के बाद, इन दूरस्थ और जनजातीय क्षेत्रों में एक स्थायी, न्यायसंगत और **समावेशी विकास मॉडल (Inclusive Development Model)** की स्थापना करना राज्य के समक्ष सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती बन गया है।
2. नक्सलवाद के बाद के विकास मॉडल का सकारात्मक पक्ष (Strengths):
- बुनियादी ढांचे का विस्तार: 'अपेक्षाकृत कम प्रभावित क्षेत्रों' में 'रोड रिक्वायरमेंट्स प्लान' (RRP) के तहत सड़कों का जाल बिछाया गया है और मोबाइल टावरों की स्थापना कर डिजिटल कनेक्टिविटी को मजबूत किया गया है।
- लक्षित सामाजिक हस्तक्षेप: 'आकांक्षी जिला कार्यक्रम' (Aspirational Districts Programme) के माध्यम से स्वास्थ्य, शिक्षा और वित्तीय समावेशन जैसे प्रमुख संकेतकों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।
- कौशल विकास और शिक्षा: उग्रवाद प्रभावित जिलों में स्थानीय युवाओं को रोजगारोन्मुख बनाने के लिए 'लर्न एंड अर्न' योजनाएँ और आदिवासी बच्चों के लिए 'एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय' (EMRS) मील का पत्थर साबित हो रहे हैं।
⚠️ विकास मॉडल की मुख्य कमियाँ एवं चुनौतियाँ (Critical Limitations)
- 'टॉप-डाउन' बनाम 'बॉटम-अप' दृष्टिकोण: वर्तमान विकास मॉडल अक्सर दिल्ली या राज्य की राजधानियों से संचालित होता है, जो स्थानीय जनजातीय संस्कृति और उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं की उपेक्षा करता है।
- जल-जंगल-जमीन का अलगाव: बुनियादी ढांचे और खनन परियोजनाओं के नाम पर होने वाला विस्थापन आज भी स्थानीय आदिवासियों में 'अलगाव की भावना' को जन्म देता है, जिसका लाभ उग्रवादी तत्व स्लीपर सेल्स के माध्यम से उठा सकते हैं।
- संस्थागत क्षमता का अभाव: हिंसा कम होने के बाद भी इन दुर्गम क्षेत्रों में डॉक्टरों, शिक्षकों और कुशल प्रशासनिक अधिकारियों की भारी कमी है, जिससे सरकारी योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुँच पाता।
3. संधारणीय एवं समावेशी समाधान (Solutions):
- पेसा (PESA) और वनाधिकार अधिनियम का कड़ाई से अनुपालन: पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम (PESA 1996) और वनाधिकार अधिनियम (FRA 2006) को वास्तविक रूप से लागू कर 'ग्राम सभाओं' को आर्थिक और विधिक अधिकार सौंपे जाएं, ताकि संसाधनों पर उनका स्वामित्व सुरक्षित रहे।
- प्रशासनिक सुधार (2nd ARC का संदर्भ): द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) ने अपनी **8वीं रिपोर्ट (द्वंद्व का समाधान)** में स्पष्ट कहा है कि उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में सुशासन (Good Governance) बहाल करने के लिए स्थानीय प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म करना होगा और पुनर्वास (Rehabilitation) नीतियों को पारदर्शी बनाना होगा। आयोग के अनुसार, 'सुरक्षा' और 'विकास' को समानांतर रूप से चलना चाहिए।
- लघु वनोपज (MFP) आधारित मूल्य संवर्धन: स्थानीय वन उपज के प्रसंस्करण (Processing) के लिए स्थानीय स्तर पर मूल्य संवर्धन उद्योग (जैसे ट्राइब्स इंडिया के तहत) स्थापित किए जाएं, जिससे युवाओं को स्थायी आजीविका मिल सके।
4. निष्कर्ष (Conclusion):
निष्कर्षतः, वामपंथी उग्रवाद के बाद का विकास मॉडल केवल कंक्रीट की सड़कों या इमारतों के निर्माण तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें मानवीय गरिमा, अधिकारों के संरक्षण और विश्वास बहाली (Trust Building) का समावेश होना अनिवार्य है। जब तक स्थानीय जनजातीय आबादी खुद को इस विकास प्रक्रिया का हिस्सा नहीं समझेगी, तब तक शांति स्थायी नहीं हो सकती। सुरक्षा बलों द्वारा जीती गई जमीन पर **'सहानुभूतिपूर्ण और जन-केंद्रित शासन'** स्थापित करना ही नए भारत की प्राथमिकता होनी चाहिए।
🔍 People Also Ask / आंतरिक सुरक्षा एवं विकास केंद्रित मुख्य तथ्य
Q1. वामपंथी उग्रवाद से निपटने के लिए गृह मंत्रालय की 'SAMADHAN' रणनीति क्या है?
यह वर्ष 2017 में उग्रवाद के पूर्ण समाधान के लिए शुरू की गई एक बहु-आयामी रणनीति है। इसका प्रत्येक अक्षर एक विशिष्ट दृष्टिकोण को दर्शाता है: **S**- Smart Leadership, **A**- Aggressive Strategy, **M**- Motivation and Training, **A**- Actionable Intelligence, **D**- Dashboard-based KPIs, **H**- Harnessing Technology, **A**- Action Plan for each Theatre, और **N**- No Access to Financing.
Q2. पेसा (PESA) अधिनियम, 1996 आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने में कैसे सहायक है?
PESA अधिनियम संविधान की **5वीं अनुसूची** के क्षेत्रों में पारंपरिक ग्राम सभाओं को आत्मनिर्भरता और स्थानीय स्वशासन का अधिकार देता है। लघु वनोपज, भूमि अधिग्रहण के नियमन और स्थानीय विवादों के निपटारे का अधिकार सीधे आदिवासियों को देकर यह कानून उनके भीतर शासन के प्रति अविश्वास को कम करता है, जो नक्सली विचारधारा के प्रसार को रोकने की सबसे मजबूत विधिक कडी है।
“किसी भी लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की सफलता उसके संस्थागत ढाँचे एवं नीति-निर्माण की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। भारत के प्रशासनिक ढाँचे में आवश्यक सुधारों पर चर्चा कीजिए।”
(अंक: 15 / शब्द संख्या: 250) - GS Paper-2 (Governance & Role of Civil Services in a Democracy)1. प्रस्तावना (Introduction):
भारतीय प्रशासनिक ढाँचा (Civil Services) देश की एकता, अखंडता और नीति-क्रियान्वयन की रीढ़ रहा है। सरदार वल्लभभाई पटेल ने इसे भारत का 'स्टील फ्रेम' कहा था। हालांकि, 21वीं सदी की जटिल सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों, तकनीकी प्रगति और नागरिक आकांक्षाओं के कारण इस औपनिवेशिक विरासत वाले प्रशासनिक ढाँचे में व्यापक और ढांचागत सुधारों (Structural Reforms) की आवश्यकता महसूस की जा रही है, ताकि इसे अधिक उत्तरदायी, पारदर्शी और परिणाम-उन्मुख (Outcome-oriented) बनाया जा सके।
2. भारतीय प्रशासनिक ढाँचे की मुख्य चुनौतियाँ (Key Structural Challenges):
- विशेषज्ञता का अभाव (Generalist vs Specialist): भारतीय सिविल सेवा में अभी भी सामान्यज्ञों (Generalists) का प्रभुत्व है। साइबर सुरक्षा, जटिल वित्तीय विनिमय और पर्यावरण जैसे तकनीकी क्षेत्रों में नीति-निर्माण के लिए विशिष्ट वैज्ञानिक या डोमेन विशेषज्ञता की कमी महसूस होती है।
- प्रक्रियात्मक जटिलता और लालफीताशाही (Red Tapism): प्रशासनिक तंत्र में 'परिणाम' से अधिक 'प्रक्रिया' (Rules over Outcomes) को प्राथमिकता दी जाती है, जिससे नीति-क्रियान्वयन में अत्यधिक विलंब होता है।
- अल्प कार्यकाल और राजनीतिक हस्तक्षेप: बार-बार होने वाले प्रशासनिक तबादलों (Frequent Transfers) के कारण अधिकारी किसी क्षेत्र की दीर्घकालिक समस्याओं को समझने और नीतियों को स्थिरता से लागू करने में असमर्थ रहते हैं।
⚠️ नीति-निर्माण एवं जवाबदेही में कमियाँ (Accountability Gaps)
- 'साइलो' में कार्य करने की प्रवृत्ति (Silo Mentality): विभिन्न विभागों और मंत्रालयों के बीच आपस में समन्वय (Inter-departmental Coordination) की कमी होती है, जिससे एकीकृत नीति-निर्माण बाधित होता है।
- जवाबदेही का अभाव: वर्तमान तंत्र में प्रदर्शन के मूल्यांकन (Performance Appraisal) का कोई पुख्ता और पारदर्शी पैमाना नहीं है, जिससे अकुशल अधिकारियों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई या डिमोशन अत्यंत दुर्लभ होता है।
3. आवश्यक प्रशासनिक सुधार (Required Reforms):
- डोमेन विशेषज्ञता और लेटरल एंट्री (Lateral Entry): नीति-निर्माण को गुणवत्तापूर्ण बनाने के लिए निजी क्षेत्र और शिक्षा जगत के विशेषज्ञों को मध्य और उच्च स्तर के प्रशासनिक पदों पर 'लेटरल एंट्री' के माध्यम से शामिल करने की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए।
- प्रशासनिक सुधार (2nd ARC का संदर्भ): द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) ने अपनी **10वीं रिपोर्ट (कार्मिक प्रशासन का पुनर्गठन)** में स्पष्ट सिफारिश की है कि सिविल सेवकों के लिए करियर के एक निश्चित चरण (जैसे 13-14 वर्ष की सेवा) के बाद विशिष्ट डोमेन (जैसे वित्त, आंतरिक सुरक्षा, सामाजिक नीति) का निर्धारण अनिवार्य होना चाहिए। इसके अतिरिक्त, आयोग ने 'सिटिजन चार्टर' को प्रभावी बनाने और प्रदर्शन-आधारित कार्यकाल (Performance-linked tenure) की वकालत की है।
- ई-गवर्नेंस और प्रक्रियाओं का सरलीकरण: शासन में तकनीकी उपकरणों (जैसे एआई और बिग डेटा) का उपयोग कर फाइलों के निपटान की गति बढ़ाई जाए। **'मिशन कर्मयोगी'** के माध्यम से लोक सेवकों की क्षमता निर्माण (Capacity Building) को 'नियम-आधारित' से 'भूमिका-आधारित' (Role-based) में परिवर्तित किया जाए।
- कार्यकाल की स्थिरता (Tenure Security): 'होता समिति' की सिफारिशों के अनुरूप सिविल सेवकों को न्यूनतम निश्चित कार्यकाल प्रदान करने के लिए राज्यों में स्वतंत्र 'सिविल सेवा बोर्ड' (Civil Services Board) को प्रभावी ढंग से क्रियान्वित किया जाए।
4. निष्कर्ष (Conclusion):
निष्कर्षतः, प्रशासनिक सुधार कोई एकमुश्त प्रक्रिया नहीं बल्कि एक सतत यात्रा है। 'न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन' (Minimum Government, Maximum Governance) के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रशासनिक तंत्र को नियंत्रणकारी मानसिकता से मुक्त होकर एक **'सुविधाप्रदाता' (Facilitator)** की भूमिका अपनानी होगी। 2nd ARC की सिफारिशों को धरातल पर लागू करके ही हम एक संवेदनशील, जवाबदेह और 'जन-केंद्रित' (People-centric) प्रशासनिक व्यवस्था का निर्माण कर सकते हैं।
🔍 People Also Ask / प्रशासनिक सुधार केंद्रित मुख्य तथ्य
Q1. सिविल सेवाओं में 'मिशन कर्मयोगी' (Mission Karmayogi) क्या है?
यह राष्ट्रीय लोक सेवा क्षमता विकास कार्यक्रम (NPCSCB) है, जिसे सिविल सेवकों के क्षमता निर्माण के आधुनिकीकरण के लिए शुरू किया गया है। इसका उद्देश्य लोक सेवकों को अधिक रचनात्मक, कल्पनाशील, पारदर्शी और तकनीकी रूप से सक्षम बनाना है, ताकि वे डिजिटल मंच (iGOT-Karmayogi) के माध्यम से अपनी कार्यप्रणाली में सुधार कर सकें।
Q2. द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) के अध्यक्ष कौन थे और इसकी मुख्य भूमिका क्या है?
द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन वर्ष 2005 में **वीरप्पा मोइली** की अध्यक्षता में किया गया था। इसका मुख्य कार्य भारत की प्रशासनिक व्यवस्था का व्यापक मूल्यांकन करना और लोक प्रशासन में शुचिता, सुशासन, वित्तीय प्रबंधन, नागरिक-केंद्रित प्रशासन और लोक व्यवस्था जैसे प्रमुख विषयों पर व्यावहारिक सुधारों हेतु संस्तुतियां देना था। आयोग ने कुल 15 रिपोर्टें प्रस्तुत की थीं।
“डिजिटल युग में ऐतिहासिक एवं प्रशासनिक अभिलेखों का संरक्षण सुशासन एवं पारदर्शिता के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? भारत के समक्ष मौजूद चुनौतियों एवं उपायों का विश्लेषण कीजिए।”
(अंक: 10 / शब्द संख्या: 150) - GS Paper-2 (Governance & Accountability)1. सुशासन एवं पारदर्शिता के लिए महत्व (Significance):
डिजिटल युग में अभिलेखों (Records) का संरक्षण संस्थागत स्मृति (Institutional Memory) को बनाए रखने और 'जवाबदेही' तय करने का मूल आधार है। यह साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण (Evidence-based Policy) को बढ़ावा देता है, प्रशासनिक लालफीताशाही को कम करता है तथा नागरिकों के लिए **सूचना के अधिकार (RTI)** के तहत डेटा तक त्वरित व पारदर्शी पहुँच सुनिश्चित कर 'सिटिजन-सेंट्रिक' गवर्नेंस की स्थापना करता है।
⚠️ मुख्य चुनौतियाँ (Key Challenges)
- तकनीकी अप्रचलन (Obsolescence): तेजी से बदलते सॉफ्टवेयर और फाइल फॉर्मेट के कारण पुराने डिजिटल रिकॉर्ड्स को लंबे समय तक सुलभ रखना कठिन होता है।
- साइबर सुरक्षा और डेटा ब्रीच: केंद्रीकृत डिजिटल डेटाबेस पर रैनसमवेयर और हैकिंग का लगातार खतरा बना रहता है, जिससे संवेदनशील प्रशासनिक डेटा लीक हो सकता है।
- मानकीकरण का अभाव: विभिन्न सरकारी विभागों के बीच रिकॉर्ड कीपिंग (Record Management) के लिए एक समान डिजिटल प्रोटोकॉल या वर्गीकरण पद्धति की कमी है।
2. सुधारात्मक उपाय (Way Forward):
- सार्वजनिक रिकॉर्ड्स का आधुनिकीकरण: राष्ट्रीय अभिलेखागार (National Archives) की तकनीकी क्षमता का विस्तार कर 'क्लाउड-आधारित' सुरक्षित और विकेंद्रीकृत (Blockchain-backed) स्टोरेज सिस्टम विकसित किया जाए।
- प्रशासनिक सुधार (2nd ARC का संदर्भ): द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) ने अपनी **1वीं रिपोर्ट (RTI)** और **11वीं रिपोर्ट (ई-गवर्नेंस)** में सिफारिश की है कि प्रत्येक सरकारी कार्यालय में एक समर्पित 'रिकॉर्ड प्रबंधन नीति' होनी चाहिए। सूचनाओं को केवल संचित न किया जाए, बल्कि सुशासन के लिए उनका 'प्रो-एक्टिव डिस्क्लोजर' (RTI की धारा 4) सुनिश्चित करने के लिए कैटलॉगिंग को अनिवार्य बनाया जाए।
- क्षमता निर्माण: लोक सेवकों को आधुनिक डिजिटल आर्काइविंग तकनीकों और *डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम* के अनुपालन हेतु नियमित प्रशिक्षित किया जाए।
3. निष्कर्ष (Conclusion):
निष्कर्षतः, प्रशासनिक अभिलेख अतीत के दस्तावेज मात्र नहीं हैं, बल्कि वे पारदर्शी भविष्य की नींव हैं। तकनीकी सुरक्षा और 2nd ARC के जन-केंद्रित दृष्टिकोण को अपनाकर ही हम लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों के भरोसे को सुदृढ़ कर सकते हैं।
🔍 People Also Ask / सुशासन एवं डिजिटल रिकॉर्ड प्रबंधन मुख्य तथ्य
Q1. सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम की धारा 4(1)(b) क्या है?
यह धारा लोक प्राधिकारियों (Public Authorities) द्वारा सूचनाओं के **'स्वतः प्रकटीकरण' (Pro-active/Suo-motu Disclosure)** से संबंधित है। इसके तहत सरकारी विभागों को अपने संगठन, कार्यों, निर्णयों और अभिलेखों को डिजिटल माध्यमों पर पहले से ही सार्वजनिक रखना होता है, ताकि नागरिकों को जानकारी मांगने के लिए औपचारिक आवेदन की कम से कम आवश्यकता पड़े।
Q2. भारत में 'राष्ट्रीय अभिलेखागार' (National Archives of India - NAI) की क्या भूमिका है?
संस्कृति मंत्रालय के तहत कार्यरत NAI भारत सरकार के गैर-चालू (Non-current) स्थायी रिकॉर्ड्स का मुख्य संरक्षक है। यह ऐतिहासिक और प्रशासनिक अभिलेखों के वैज्ञानिक संरक्षण, डिजिटलीकरण और शोधकर्ताओं हेतु उनकी सुलभता सुनिश्चित करने वाली देश की नोडल नोड है, जिसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है।
“"Startup India" पहल ने भारत में नवाचार एवं उद्यमिता को नई दिशा प्रदान की है। इसके प्रमुख योगदान, चुनौतियों तथा आत्मनिर्भर भारत के संदर्भ में इसकी भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।”
(अंक: 15 / शब्द संख्या: 250) - GS Paper-3 (Indian Economy and Issues Relating to Planning, Mobilization of Resources, Growth and Employment)1. प्रस्तावना (Introduction):
वर्ष 2016 में शुरू की गई **"स्टार्टअप इंडिया" (Startup India)** पहल ने भारत को वैश्विक स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र में तीसरे सबसे बड़े वैश्विक केंद्र (Global Hub) के रूप में स्थापित किया है। इस नीति ने पारंपरिक 'नौकरी चाहने वाले' (Job Seekers) के दृष्टिकोण को 'नौकरी देने वाले' (Job Creators) के रूप में परिवर्तित किया है। यह पहल देश में तकनीकी समावेशन, नवाचार (Innovation) और आर्थिक विकेंद्रीकरण को बढ़ावा देकर *आत्मनिर्भर भारत* के सपने को साकार करने का एक मुख्य इंजन बन गई है।
2. स्टार्टअप इंडिया के प्रमुख योगदान (Key Contributions):
- यूनिकॉर्न इकोसिस्टम और मूल्य सृजन: भारत में मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स की संख्या 1 लाख से अधिक हो चुकी है, जिनमें 100 से अधिक यूनिकॉर्न (Unicorns) शामिल हैं। इन्होंने डिजिटल कॉमर्स, फिनटेक और एडटेक जैसे क्षेत्रों में अभूतपूर्व मूल्य सृजन (Value Creation) किया है।
- टियर-2 और टियर-3 शहरों का लोकतंत्रीकरण: स्टार्टअप्स अब केवल बेंगलुरु, मुंबई या दिल्ली तक सीमित नहीं हैं। 'स्टार्टअप इंडिया' के क्षेत्रीय प्रोत्साहन के कारण लगभग 45-50% मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स छोटे शहरों और अर्ध-शहरी क्षेत्रों से उभर रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय आर्थिक असंतुलन कम हो रहा है।
- रोजगार और वित्तीय समावेशन: इन उद्यमों ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाखों उच्च-कौशल युक्त रोजगार पैदा किए हैं, साथ ही देश में गिग इकोनॉमी (Gig Economy) को एक नया विस्तार दिया है।
⚠️ स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र के समक्ष चुनौतियाँ (Key Structural Challenges)
- फंडिंग विंटर (Funding Winter): वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव के कारण स्टार्टअप्स को 'लेट-स्टेज' फंडिंग प्राप्त करने में भारी कठिनाई हो रही है, जिससे उनके संधारणीय (Sustainable) विकास पर असर पड़ा है।
- नियामक जटिलता और 'एंजेल टैक्स' संबंधी चिंताएं: यद्यपि करों में छूट के प्रावधान किए गए हैं, फिर भी अनुपालन लागत (Compliance Cost) और जटिल कॉर्पोरेट प्रशासन (Corporate Governance) के कारण नवोदित उद्यमियों को नौकरशाही बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
- अनुसंधान और विकास (R&D) पर कम खर्च: अधिकांश भारतीय स्टार्टअप्स मौजूदा व्यापार मॉडलों के 'अनुकरण' (Copycat Models) पर आधारित हैं। डीप-टेक, बायोटेक और कोर हार्डवेयर नवाचार में मौलिक अनुसंधान के लिए पूंजी का भारी अभाव है।
3. 'आत्मनिर्भर भारत' के संदर्भ में भूमिका (Role in Self-Reliant India):
- आयात प्रतिस्थापन (Import Substitution): रक्षा, ड्रोन निर्माण और सेमीकंडक्टर जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में घरेलू स्टार्टअप्स ने विदेशी निर्भरता को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है (जैसे iDEX पहल के तहत)।
- स्वदेशी डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (DPI): स्टार्टअप्स ने यूपीआई (UPI), ओएनडीसी (ONDC) और डिजिलॉकर जैसे राष्ट्रीय स्तर के डिजिटल बुनियादी ढांचे का उपयोग कर कृषि-तकनीक (Agri-tech) और स्वास्थ्य-तकनीक (Health-tech) में स्वदेशी समाधान विकसित किए हैं।
4. आगे की राह एवं सुधारात्मक उपाय (Way Forward):
- नियामक सरलीकरण (2nd ARC का संदर्भ): द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) ने अपनी **14वीं रिपोर्ट (वित्तीय प्रबंधन प्रणाली सुदृढ़ीकरण)** में व्यापार करने में सुगमता (Ease of Doing Business) के लिए विनियामक प्रक्रियाओं को सरल बनाने, बहु-स्तरीय स्वीकृतियों को समाप्त करने और 'स्व-प्रमाणीकरण' (Self-Certification) को बढ़ावा देने की सिफारिश की है। स्टार्टअप्स के लिए अनुपालन तंत्र को पूरी तरह 'फेसलेस' और डिजिटल किया जाना चाहिए।
- घरेलू पूंजी को प्रोत्साहन: विदेशी उद्यम पूंजीपतियों (VCS) पर निर्भरता कम करने के लिए भारतीय बीमा कंपनियों, पेंशन फंडों और घरेलू उच्च-नेट-वर्थ व्यक्तियों (HNIs) को स्टार्टअप इकोसिस्टम में निवेश के लिए कर प्रोत्साहन दिए जाने चाहिए।
5. निष्कर्ष (Conclusion):
निष्कर्षतः, 'स्टार्टअप इंडिया' केवल एक आर्थिक कार्यक्रम नहीं बल्कि देश के युवा मानस के पुनर्जागरण का प्रतीक है। फंडिंग की चुनौतियों और नियामक विसंगतियों को दूर कर, तथा 2nd ARC के सिद्धांतों के अनुरूप एक सरलीकृत व्यावसायिक माहौल प्रदान करके ही हम भारत को न केवल 'स्टार्टअप्स का देश' बल्कि वैश्विक नवाचार के शीर्ष नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित कर सकते हैं।
🔍 People Also Ask / स्टार्टअप एवं भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्य तथ्य
Q1. स्टार्टअप के संदर्भ में 'एंजेल टैक्स' (Angel Tax) क्या होता है?
जब एक गैर-सूचीबद्ध कंपनी (Unlisted Company/Startup) किसी बाहरी निवेशक (Angel Investor) को उसके उचित बाजार मूल्य (Fair Market Value - FMV) से अधिक कीमत पर शेयर जारी करती है, तो अतिरिक्त प्राप्त पूंजी को 'अन्य स्रोतों से आय' मानकर उस पर टैक्स लगाया जाता था, जिसे आयकर अधिनियम की धारा 56(2)(viib) के तहत 'एंजेल टैक्स' कहा गया। हालांकि, स्टार्टअप्स को राहत देने के लिए सरकार ने इसमें व्यापक छूट प्रदान की है।
Q2. ओएनडीसी (ONDC) क्या है और यह छोटे स्टार्टअप्स की कैसे मदद करता है?
Open Network for Digital Commerce (ONDC) उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) की एक अनूठी डिजिटल पहल है। यह ई-कॉमर्स क्षेत्र को एकाधिकारवादी बड़े प्लेटफॉर्म्स (जैसे अमेज़न, फ्लिपकार्ट) के नियंत्रण से मुक्त कर एक खुला नेटवर्क प्रदान करता है, जिससे छोटे किराना व्यापारियों और नए स्टार्टअप्स को सीधे बड़े उपभोक्ता आधार तक बिना किसी भारी कमीशन के पहुँच मिलती है।
“भारत की सुरक्षा रणनीति में S-400 वायु रक्षा प्रणाली का क्या महत्व है? क्षेत्रीय सुरक्षा, सामरिक संतुलन एवं आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन के संदर्भ में चर्चा कीजिए।”
(अंक: 15 / शब्द संख्या: 250) - GS Paper-3 (Science & Technology- Developments in Defence / Internal Security)1. प्रस्तावना (Introduction):
रूस द्वारा विकसित **S-400 ट्रायम्फ (S-400 Triumf)** विश्व की सबसे उन्नत मोबाइल सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली (SAM) है। दो मोर्चों पर युद्ध (Two-Front War) की सामरिक चुनौती और सीमा पर बढ़ते हवाई खतरों (ड्रोन, क्रूज व बैलिस्टिक मिसाइलें, फिफ्थ-जनरेशन स्टील्थ फाइटर्स) के बीच S-400 को भारतीय वायुसेना (IAF) में शामिल करना भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में एक गेम-चेंजर (Game-changer) साबित हुआ है। यह प्रणाली भारत को एक अभेद्य 'एंटी-एक्सेस/एरिया डिनायल' (A2/AD) क्षमता प्रदान करती है।
2. सुरक्षा रणनीति के विभिन्न आयामों में इसका महत्व (Key Dimensions):
A. क्षेत्रीय सुरक्षा और प्रतिरोधक क्षमता (Regional Security & Deterrence):
- मल्टी-लेयर्ड डिफेंस और व्यापक रेंज: S-400 प्रणाली 400 किमी तक की दूरी और 30 किमी की ऊंचाई पर दुश्मन के विमानों, मिसाइलों और यूएवी (UAVs) को नष्ट कर सकती है। पश्चिमी (पाकिस्तान) और उत्तरी (चीन) सीमाओं पर इसकी तैनाती भारत को 'डीप-स्ट्राइक' सुरक्षा घेरा प्रदान करती है।
- एक साथ कई लक्ष्यों पर प्रहार: यह प्रणाली एक साथ 80 लक्ष्यों को ट्रैक कर सकती है और 160 मिसाइलों को नियंत्रित कर सकती है, जो 'थ्रेशोल्ड/संतृप्ति हमलों' (Saturation Attacks) को विफल करने में सक्षम है।
B. सामरिक संतुलन (Strategic Balancing):
- बहु-ध्रुवीय कूटनीति की जीत: अमेरिकी प्रतिबंध कानून **CAATSA** (Countering America's Adversaries Through Sanctions Act) के दबाव के बावजूद रूस से S-400 की खरीद भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) को सिद्ध करती है।
- चीन के समकक्ष शक्ति संतुलन: चीन द्वारा वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के निकट अपनी S-400 प्रणालियों की तैनाती के बाद, भारत के लिए यह सौदा सैन्य और तकनीकी संतुलन स्थापित करने के लिए अपरिहार्य था।
⚠️ निर्भरता बनाम आत्मनिर्भरता की चुनौती (The Self-Reliance Dilemma)
S-400 एक विदेशी आयातित प्रणाली है। रूस-यूक्रेन भू-राजनीतिक संघर्ष के कारण कलपुर्जों (Spare parts) की आपूर्ति में व्यवधान और भुगतान प्रणालियों में आने वाली तकनीकी बाधाओं ने भारत की बाहरी रक्षा निर्भरता के जोखिम को उजागर किया है।
- 'प्रोजेक्ट कुशा' (Project Kusha) को प्रेरणा: इस निर्भरता को कम करने के लिए DRDO द्वारा स्वदेशी लॉन्ग-रेंज एयर डिफेंस सिस्टम (LR-SAM) विकसित किया जा रहा है, जो S-400 की तर्ज पर ही भारत को त्रि-स्तरीय सुरक्षा घेरा देगा।
- रक्षा एकीकरण: S-400 के आने से भारत ने अपने स्वदेशी प्रणालियों (आकाश, एमआरएसएएम) को एकीकृत (Integrated Air Command and Control System - IACCS) करने की प्रक्रिया तेज कर दी है, जिससे स्वदेशी रक्षा उत्पादन का इकोसिस्टम मजबूत हो रहा है।
3. प्रशासनिक सुदृढ़ीकरण (2nd ARC का संदर्भ):
द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) ने अपनी विभिन्न रिपोर्टों में संकट प्रबंधन (Crisis Management) और राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में **'अंतर-एजेंसी समन्वय' (Inter-agency Coordination)** पर विशेष बल दिया है। S-400 जैसी जटिल प्रणालियों के संचालन और स्वदेशी प्रणालियों के साथ उनके 'इंटरऑपरेबिलिटी' (Interoperability) को सुनिश्चित करने के लिए थियेटर कमांड (Theatre Commands) के गठन की प्रशासनिक गति को तीव्र करना होगा, ताकि सेना के तीनों अंगों के बीच सटीक रणनीतिक तालमेल स्थापित हो सके।
4. निष्कर्ष (Conclusion):
निष्कर्षतः, S-400 वायु रक्षा प्रणाली वर्तमान में भारत के आकाश को सुरक्षित रखने वाली एक मजबूत सामरिक ढाल है। हालांकि, दीर्घकालिक सुरक्षा का मार्ग केवल पूर्ण आत्मनिर्भरता से ही प्रशस्त हो सकता है। भारत को S-400 से प्राप्त तकनीकी अनुभवों का उपयोग स्वदेशी 'प्रोजेक्ट कुशा' के त्वरित विकास में करना चाहिए, ताकि देश 'मेक इन इंडिया' के तहत न केवल अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा करे, बल्कि भविष्य में रक्षा निर्यात का वैश्विक केंद्र भी बन सके।
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Q1. S-400 प्रणाली की 'त्रि-स्तरीय मिसाइल क्षमता' (Multi-layered Capability) क्या है?
S-400 कोई एक मिसाइल नहीं है, बल्कि एक संपूर्ण मिसाइल प्रणाली है जो अलग-अलग रेंज की 4 प्रकार की मिसाइलों (अति-दीर्घ दूरी 40N6E - 400 किमी, दीर्घ दूरी 48N6 - 250 किमी, मध्यम दूरी 9M96E2 - 120 किमी, और लघु दूरी 9M96E - 40 किमी) का उपयोग कर सकती है। यह विशिष्टता इसे एक साथ बेहद करीब और अत्यधिक दूरी पर आ रहे विविध हवाई खतरों को नष्ट करने की बहुमुखी क्षमता प्रदान करती है।
Q2. भारत का 'प्रोजेक्ट कुशा' (Project Kusha) क्या है?
**प्रोजेक्ट कुशा** रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) द्वारा संचालित एक रणनीतिक कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य भारत की अपनी स्वदेशी लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली (LR-SAM) का निर्माण करना है। यह प्रणाली लगभग 350 किमी की दूरी तक दुश्मन के स्टील्थ विमानों, ड्रोन और क्रूज मिसाइलों को इंटरसेप्ट करने में सक्षम होगी, और इसे इजरायल के आयरन डोम और रूस के S-400 के भारतीय विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
“पूर्वोत्तर भारत के समावेशी विकास एवं क्षेत्रीय एकीकरण में North Eastern Council (NEC) की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए। वर्तमान चुनौतियों एवं सुधार की संभावनाओं पर चर्चा कीजिए।”
(अंक: 15 / शब्द संख्या: 250) - GS Paper-2 (Statutory, Regulatory and various Quasi-judicial bodies / Federal Structure)1. प्रस्तावना (Introduction):
वर्ष 1971 में एक वैधानिक निकाय (Statutory Body) के रूप में गठित **उत्तर पूर्वी परिषद (North Eastern Council - NEC)** पूर्वोत्तर के आठ राज्यों के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए नोडल क्षेत्रीय एजेंसी है। अंतर-राज्यीय समन्वय को सुगम बनाने और इस रणनीतिक सीमावर्ती क्षेत्र के संतुलित विकास को गति देने के लिए स्थापित यह परिषद, भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' (Act East Policy) और क्षेत्रीय एकीकरण (Regional Integration) का एक प्रमुख स्तंभ है।
2. समावेशी विकास एवं क्षेत्रीय एकीकरण में भूमिका (Evaluation of Role):
- बुनियादी ढांचा और कनेक्टिविटी का विकास: NEC ने पूर्वोत्तर के दुर्गम इलाकों में सड़कों (जैसे अंतर-राज्यीय लिंक रोड), पुलों और क्षेत्रीय हवाई अड्डों के आधुनिकीकरण के लिए प्रमुख वित्तीय व तकनीकी सहायता प्रदान की है, जिसने अलगाव की भौगोलिक चुनौती को कम किया है।
- क्षेत्रीय योजना और संस्थागत निर्माण: परिषद ने क्षेत्र में विशिष्ट संस्थानों जैसे—'नॉर्थ ईस्टर्न क्षेत्रीय जल और भूमि प्रबंधन संस्थान' (NERIWALM) और 'नेकरिहंड्स' (NEHHDC) की स्थापना कर मानव संसाधन और हस्तशिल्प को बढ़ावा दिया है।
- विवाद समाधान और रणनीतिक एकीकरण: यह परिषद उत्तर-पूर्व के राज्यों के बीच सीमा विवादों और अंतर-राज्यीय सुरक्षा चिंताओं को साझा विमर्श के माध्यम से सुलझाने के लिए एक महत्वपूर्ण सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) का मंच प्रदान करती है।
⚠️ परिषद के समक्ष मौजूद वर्तमान चुनौतियाँ (Core Challenges)
- परामर्शदात्री प्रकृति (Advisory Body): NEC मुख्य रूप से एक सलाहकार निकाय है। इसके पास अपनी योजनाओं को राज्यों पर कड़ाई से लागू करने या विनियामक दंडात्मक कार्रवाई करने की कोई वास्तविक विधिक शक्ति नहीं है।
- DoNER मंत्रालय के साथ ओवरलैपिंग: वर्ष 2001 में **उत्तर पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्रालय (DoNER)** के गठन के बाद से, बजट आवंटन और परियोजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर NEC और DoNER के बीच प्रशासनिक अधिकार क्षेत्रों का दोहराव (Overlapping) देखने को मिलता है, जिससे निर्णय लेने में देरी होती है।
- वित्तीय बाधाएं और कम बजटीय उपयोग: परिषद को मिलने वाला प्रत्यक्ष वित्तीय कोष राष्ट्रीय प्राथमिकताओं की तुलना में सीमित है, साथ ही उत्तर-पूर्व के राज्यों में 'प्रशासनिक क्षमता' की कमी के कारण आवंटित धन का समय पर पूर्ण उपयोग (Underutilization) नहीं हो पाता।
3. सुधार की संभावनाएँ एवं आगे की राह (Required Reforms):
- प्रशासनिक सुधार (2nd ARC का संदर्भ): द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) ने अपनी **7वीं रिपोर्ट (उत्तर-पूर्व में क्षमता निर्माण और सुशासन)** में स्पष्ट वकालत की है कि NEC को केवल धन आवंटित करने वाली एजेंसी के बजाय एक 'क्षेत्रीय रणनीतिक थिंक-टँक' (Regional Strategic Think-tank) के रूप में पुनर्गठित किया जाना चाहिए। आयोग के अनुसार, DoNER और NEC के बीच कार्यों का स्पष्ट विभाजन होना चाहिए, जहाँ NEC दीर्घकालिक क्षेत्रीय योजनाएं बनाए और स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक क्षमता (Capacity Building) बढ़ाने का जिम्मा संभाले।
- वित्तीय स्वायत्तता और 'अकाउंटेबिलिटी': परिषद को और अधिक बजटीय स्वायत्तता दी जाए, लेकिन साथ ही परियोजनाओं की जियो-टैगिंग (Geo-tagging) और वास्तविक समय की निगरानी (Real-time monitoring) सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल डैशबोर्ड को अनिवार्य किया जाए।
- सीमा पार व्यापार एकीकरण: दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ आर्थिक संबंधों को सुदृढ़ करने के लिए, भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग और कालादान मल्टी-मोडल परियोजना जैसी सीमा-पार कनेक्टिविटी परियोजनाओं के प्रबंधन में NEC को सीधे भागीदार बनाया जाना चाहिए।
4. निष्कर्ष (Conclusion):
निष्कर्षतः, पूर्वोत्तर भारत केवल भौगोलिक रूप से देश का सिरा नहीं है, बल्कि यह दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए भारत का 'प्रवेश द्वार' है। 2nd ARC की संस्तुतियों के अनुरूप NEC को प्रशासनिक रूप से सशक्त और अधिक प्रासंगिक बनाकर ही हम 'अष्टलक्ष्मी' (पूर्वोत्तर के 8 राज्य) के आर्थिक सामर्थ्य का पूर्ण दोहन कर भारत के समावेशी और सतत विकास को एक नई ऊंचाई दे सकते हैं।
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Q1. उत्तर पूर्वी परिषद (NEC) की संरचना क्या है और इसका अध्यक्ष कौन होता है?
NEC में पूर्वोत्तर के सभी आठ राज्यों (अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम) के राज्यपाल और मुख्यमंत्री शामिल होते हैं। भारत के **केंद्रीय गृह मंत्री** इस परिषद के पदेन अध्यक्ष (Ex-officio Chairman) होते हैं, जबकि DoNER मंत्रालय के राज्य मंत्री इसके उपाध्यक्ष के रूप में कार्य करते हैं। इसका मुख्यालय शिलॉन्ग (मेघालय) में है।
Q2. सिक्किम को उत्तर पूर्वी परिषद (NEC) में कब शामिल किया गया था?
मूल रूप से वर्ष 1971 के अधिनियम में केवल सात राज्य (7 Sisters) शामिल थे। बाद में उत्तर पूर्वी परिषद (संशोधन) अधिनियम, 2002 के माध्यम से **सिक्किम** को इसके आठवें सदस्य राज्य के रूप में आधिकारिक तौर पर शामिल किया गया, जिसके बाद से पूर्वोत्तर विकास के क्षेत्रीय ढांचे का विस्तार हुआ।
“नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा अभियानों की सफलता के बाद अब सुशासन, आधारभूत संरचना एवं मानव विकास को प्राथमिकता देना क्यों आवश्यक है? भारत के अनुभवों के आलोक में चर्चा कीजिए।”
(अंक: 15 / शब्द संख्या: 250) - GS Paper-3 (Internal Security / Linkages of Development with Extremism)1. प्रस्तावना (Introduction):
भारत में गृह मंत्रालय की 'SAMADHAN' रणनीति और सुरक्षा बलों के कड़े अभियानों के कारण वामपंथी उग्रवाद (LWE) के हिंसक भूगोल में ऐतिहासिक सिकुड़न आई है। हालांकि, कूटनीतिक और सैन्य अभियानों द्वारा उत्पन्न की गई यह शांति तब तक अस्थायी है जब तक कि वहां उत्पन्न 'प्रशासनिक शून्यता' को नहीं भरा जाता। भारत का यह अनुभव रहा है कि सुरक्षा के बाद के चरण (Post-Security Phase) में सुशासन, बुनियादी ढांचा और मानव विकास को प्राथमिकता देना उग्रवाद के पुनरुत्थान को रोकने और स्थायी शांति स्थापित करने के लिए अनिवार्य है।
2. इन तीनों स्तंभों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता (Why it is Critical):
- विश्वास घाटे को पाटना (Governance): नक्सलवाद की जड़ें स्थानीय आबादी में व्याप्त ऐतिहासिक असंतोष और राज्य की अनुपस्थिति पर टिकी थीं। जब राशन, कल्याणकारी योजनाएं और न्याय प्रणाली (जैसे ग्राम न्यायालय) सीधे आदिवासियों तक पहुँचती हैं, तो राज्य के प्रति जनता का 'विश्वास' बहाल होता है और उग्रवादियों का वैचारिक आधार समाप्त हो जाता है।
- भौगोलिक अलगाव को तोड़ना (Infrastructure): 'सड़क आवश्यकता योजना' (RRP) और मोबाइल टावरों का निर्माण केवल परिवहन सुगम नहीं करता, बल्कि सुरक्षा बलों की त्वरित गतिशीलता को बढ़ाता है। इसके साथ ही, स्थानीय बाजारों को मुख्य भूमि से जोड़कर यह आर्थिक एकीकरण का मार्ग प्रशस्त करता है।
- पीढ़ीगत सुधार और कौशल निर्माण (Human Development): उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों के युवाओं को मुख्यधारा में बनाए रखने के लिए शिक्षा (जैसे एकलव्य विद्यालय) और स्वास्थ्य सुविधाएं बुनियादी आवश्यकताएं हैं। कौशल विकास के बिना युवा पुनः उग्रवादियों के 'सहानुभूति नेटवर्क' या स्लीपर सेल्स के जाल में फंस सकते हैं।
📊 भारत के अनुभव: आंध्र प्रदेश (ग्रेहाउंड्स) बनाम बस्तर मॉडल
भारत के पिछले तीन दशकों के अनुभव दर्शाते हैं कि केवल सैन्य कार्रवाई से नक्सलवाद का उन्मूलन नहीं हो सकता:
- सकारात्मक अनुभव: आंध्र प्रदेश में 'ग्रेहाउंड्स' की सफलता के तुरंत बाद 'दूरस्थ क्षेत्र विकास कार्यक्रम' के तहत जमीनी विकास किया गया, जिससे वहां दोबारा नक्सलवाद नहीं पनपा।
- नकारात्मक अनुभव: इसके विपरीत, जिन क्षेत्रों में सुरक्षा अभियानों के बाद सामाजिक-आर्थिक योजनाओं के क्रियान्वयन में सुस्ती बरती गई, वहां उग्रवादियों ने पुनः लामबंदी (Regrouping) कर बड़े हमलों को अंजाम दिया।
3. प्रशासनिक ढांचा और भावी सुधार (2nd ARC का संदर्भ):
द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) ने अपनी **8वीं रिपोर्ट (द्वंद्व का समाधान)** में स्पष्ट रेखांकित किया है कि वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में पुलिसिंग को सामाजिक-आर्थिक विकास का पूरक होना चाहिए। आयोग की संस्तुति है कि इन क्षेत्रों में विकास योजनाओं का प्रबंधन 'टॉप-डाउन' होने के बजाय पूरी तरह स्थानीय **ग्राम सभाओं और PESA (पेसा अधिनियम 1996)** के सुदृढ़ीकरण द्वारा 'बॉटम-अप' होना चाहिए। जब तक स्थानीय समुदायों को जल, जंगल, जमीन पर विधिक अधिकार और विकास निर्णयों में स्वायत्तता नहीं मिलेगी, तब तक शांति संधारणीय (Sustainable) नहीं हो सकती।
4. निष्कर्ष (Conclusion):
निष्कर्षतः, सुरक्षा बल युद्ध जीत सकते हैं, लेकिन शांति केवल सुशासन और विकास ही ला सकते हैं। सुरक्षा अभियानों के बाद इन क्षेत्रों को केवल एक कानून-व्यवस्था का मुद्दा न मानकर, राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा में शामिल करना होगा। 2nd ARC के सिद्धांतों और 'आकांक्षी जिला कार्यक्रम' की तर्ज पर मानवीय गरिमा को केंद्र में रखकर ही हम भारत को आंतरिक रूप से सुरक्षित और पूर्णतः आत्मनिर्भर बना सकते हैं।
🔍 People Also Ask / आंतरिक सुरक्षा एवं सुशासन मुख्य तथ्य
Q1. उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों के विकास में 'आकांक्षी जिला कार्यक्रम' (Aspirational Districts Programme) की क्या भूमिका है?
नीति आयोग द्वारा संचालित यह कार्यक्रम देश के सबसे पिछड़े जिलों (जिनमें कई नक्सल प्रभावित जिले शामिल हैं) में स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, कृषि, जल संसाधन, वित्तीय समावेशन और बुनियादी ढांचे जैसे 5 मुख्य स्तंभों पर रियल-टाइम डेटा ट्रैकिंग के माध्यम से तीव्र सुधार सुनिश्चित करता है। यह 'प्रतिस्पर्धी संघवाद' के जरिए विकास को गति देता है।
Q2. सुरक्षा बलों का 'ग्रेहाउंड्स' (Greyhounds) दस्ता क्या है?
ग्रेहाउंड्स आंध्र प्रदेश और तेलंगाना पुलिस का एक विशिष्ट एलीट कमांडो बल है, जिसका गठन 1989 में विशेष रूप से गोरिल्ला युद्ध और वामपंथी उग्रवाद विरोधी अभियानों के लिए किया गया था। इसकी कड़े जंगल-वारफेयर प्रशिक्षण और खुफिया तंत्र की वजह से इसे भारत में नक्सलवाद के विरुद्ध सबसे सफल सुरक्षा मॉडलों में से एक माना जाता है।
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