भारत में आर्द्रभूमि (Wetlands) संरक्षण: चुनौतियाँ एवं समाधान
"भारत में रामसर स्थलों की संख्या 100 तक पहुँच जाना पर्यावरणीय संरक्षण के प्रति बढ़ती प्रतिबद्धता को दर्शाता है। तथापि आर्द्रभूमियों के संरक्षण के समक्ष विद्यमान चुनौतियों एवं समाधान पर चर्चा कीजिए।" (15 अंक, 250 शब्द)
1. भूमिका (Introduction)
हाल ही में भारत में वैश्विक महत्व की आर्द्रभूमियों यानी रामसर स्थलों (Ramsar Sites) की कुल संख्या का 100 तक पहुँच जाना देश के समृद्ध जैव-विविधता नेटवर्क और अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय प्रतिबद्धताओं के सफल क्रियान्वयन को प्रमाणित करता है। आर्द्रभूमियों को 'धरती के गुर्दे' (Kidneys of the Earth) और 'जैविक सुपरमार्केट' कहा जाता है, जो जल शुद्धीकरण, बाढ़ नियंत्रण और कार्बन प्रच्छादन (Carbon Sequestration) में अद्वितीय भूमिका निभाती हैं। हालांकि, इस संख्यात्मक मील के पत्थर के बावजूद, जमीनी स्तर पर इन पारिस्थितिक तंत्रों का क्षरण एक गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है।
2. आर्द्रभूमियों के संरक्षण के समक्ष विद्यमान चुनौतियाँ (Key Challenges)
भारत में आर्द्रभूमियों के अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरों को निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं के अंतर्गत समझा जा सकता है:
- अनियोजित शहरीकरण और अतिक्रमण (Encroachment): शहरों के अनियंत्रित विस्तार के कारण शहरी आर्द्रभूमियों को कंक्रीट के ढांचे में बदला जा रहा है। उदाहरण के लिए, चेन्नई की पल्लिकरनई आर्द्रभूमि और बेंगलुरु के झीलों के जलग्रहण क्षेत्रों में हुआ अवैध निर्माण बाढ़ की विभीषिका को बढ़ाता है।
- प्रदूषण और सुपोषण (Eutrophication): औद्योगिक अपशिष्ट, घरेलू सीवेज और कृषि क्षेत्रों से बहकर आने वाले रासायनिक उर्वरकों (नाइट्रेट और फॉस्फेट) के कारण जल निकायों में 'सुपोषण' की समस्या उत्पन्न हो रही है। इससे जल में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है और जलीय जीवन नष्ट होने लगता है।
- आक्रामक विदेशी प्रजातियां (Invasive Alien Species): जलकुंभी (Water Hyacinth) और प्रॉसोपिस जुलीफ्लोरा जैसी आक्रामक प्रजातियों का तेजी से फैलना स्थानीय जलीय वनस्पतियों और जीवों के प्राकृतिक आवास को पूरी तरह अवरुद्ध कर देता है।
- जलवायु परिवर्तन और जल विज्ञान में व्यवधान: तापमान में वृद्धि और वर्षा के बदलते पैटर्न के कारण कई मौसमी आर्द्रभूमियाँ तेजी से सूख रही हैं। इसके अतिरिक्त, नदियों पर बने बांधों के कारण प्राकृतिक जल प्रवाह का रुकना भी इनके क्षरण का कारण है।
- संस्थागत ओवरलैप और नीतिगत खामियां: आर्द्रभूमि प्रबंधन में राजस्व विभाग, वन विभाग और स्थानीय नगर निकायों के बीच समन्वय की कमी पाई जाती है। 'आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017' के लागू होने के बाद भी राज्य स्तर पर इसके क्रियान्वयन की गति धीमी है।
3. प्रभावी समाधान और भावी राह (Way Forward)
आर्द्रभूमियों के दीर्घकालिक पुनरुद्धार और सतत प्रबंधन के लिए एक बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है:
- 'अमृत धरोहर' योजना का सुदृढ़ीकरण: बजट में घोषित 'अमृत धरोहर' (Amrit Dharohar) योजना के तहत स्थानीय समुदायों को शामिल करके पर्यावरण-पर्यटन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जिससे संरक्षण के साथ-साथ आजीविका भी सुनिश्चित हो सके।
- वैज्ञानिक मानचित्रण और डिजिटल डेटाबेस: रिमोट सेंसिंग और जीआईएस (GIS) तकनीकों का उपयोग करके देश की सभी छोटी-बड़ी आर्द्रभूमियों का एक एकीकृत डिजिटल मानचित्र तैयार किया जाए ताकि उनके अतिक्रमण पर उपग्रह के माध्यम से नजर रखी जा सके।
- समुदाय-आधारित सह-प्रबंधन (2nd ARC का सिद्धांत): द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के सुशासन सिद्धांतों के अनुसार, जब तक स्थानीय लोगों (मछुआरों, किसानों) को 'जल-रक्षक' के रूप में सशक्त नहीं किया जाएगा, तब तक सरकारी प्रयास अधूरे रहेंगे। लोक भागीदारी से ही विकेंद्रीकृत संरक्षण संभव है।
- 'अर्बन प्लैनिंग' में स्पंज सिटी अवधारणा: नीति आयोग की सिफारिशों के अनुरूप, नए शहरी मास्टर प्लान में आर्द्रभूमियों को 'स्पंज सिटी' (Sponge City) के अभिन्न अंग के रूप में शामिल किया जाना चाहिए, जो मानसून के अतिरिक्त पानी को सोख सकें।
- कठोर कानूनी कार्रवाई: आर्द्रभूमि क्षेत्रों में औद्योगिक कचरा फेंकने और अवैध निर्माण को गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में रखकर भारी जुर्माने का प्रावधान किया जाना चाहिए।
4. निष्कर्ष (Conclusion)
संक्षेप में, भारत में 100 रामसर स्थलों का होना गौरव का विषय अवश्य है, परंतु वास्तविक सफलता केवल संख्या बढ़ाने में नहीं बल्कि उनके पारिस्थितिक स्वास्थ्य को अक्षुण्ण रखने में है। हमें 'जल-भूमि-मनुष्य' के बीच के अंतर्संबंध को समझते हुए विकास और पर्यावरण के मध्य एक सतत संतुलन स्थापित करना होगा। आर्द्रभूमियों का संरक्षण केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं, बल्कि भारत के जल-सुरक्षित और जलवायु-लचीले (Climate-Resilient) भविष्य की अनिवार्य गारंटी है।
🦅 रामसर स्थल: टॉप सर्च किए जाने वाले प्रश्न (Q1 से Q5)
UPSC 2027 के लिए सबसे महत्वपूर्ण और बुनियादी प्रश्नों के प्रामाणिक उत्तर
रामसर स्थल उन आर्द्रभूमियों (Wetlands) को कहा जाता है जिन्हें रामसर अभिसमय (Ramsar Convention) के तहत अंतर्राष्ट्रीय महत्व का दर्जा दिया गया है। जब किसी आर्द्रभूमि को यह टैग मिलता है, तो वह वैश्विक पारिस्थितिक तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य इन अनमोल जल-निकायों को सूखने, प्रदूषित होने और नष्ट होने से बचाना है ताकि वहां की अनूठी जैव-विविधता सुरक्षित रह सके।
यह आर्द्रभूमियों के संरक्षण और उनके संसाधनों के सतत उपयोग के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय अंतर-सरकारी संधि (Intergovernmental Treaty) है। इसकी स्थापना 2 फरवरी 1971 को कैस्पियन सागर के तट पर स्थित ईरान के 'रामसर' (Ramsar) शहर में हुई थी, इसीलिए इसे 'रामसर कन्वेंशन' कहा जाता है। यही कारण है कि प्रत्येक वर्ष 2 फरवरी को दुनिया भर में 'विश्व आर्द्रभूमि दिवस' (World Wetlands Day) मनाया जाता है।
पर्यावरणीय संरक्षण के प्रति अपनी बढ़ती प्रतिबद्धता के कारण भारत में रामसर स्थलों का नेटवर्क तेजी से विस्तारित हुआ है और वर्तमान में भारत में कुल 100 रामसर स्थल हो चुके हैं। भारत ने इस संधि पर 1 फरवरी 1982 को हस्ताक्षर किए थे, और तब से लेकर अब तक देश के कोने-कोने से महत्वपूर्ण पारिस्थितिक तंत्रों को इस सूची में शामिल किया जा चुका है।
भारत के 100वें रामसर स्थल के मील के पत्थर तक पहुँचने की घोषणा हालिया पर्यावरणीय प्रयासों का एक गौरवशाली परिणाम है। यह गौरवशाली उपलब्धि देश के सतत संरक्षण और आर्द्रभूमि प्रबंधन नीतियों की वैश्विक मान्यता को दर्शाती है, जिसने भारत को दक्षिण एशिया में सबसे बड़े रामसर नेटवर्क वाले देशों में शीर्ष पर ला खड़ा किया है। *(नोट: आधिकारिक अधिसूचना और राज्यवार नवीनतम आवंटन को अपनी स्थानीय राज्य सूची के अनुसार अपडेट रखें)*।
विश्व में सबसे अधिक रामसर स्थलों वाला देश यूनाइटेड किंगडम (UK) है, जहाँ कुल 175 रामसर स्थल हैं। इसके बाद दूसरे स्थान पर मेक्सिको आता है, जहाँ 142 स्थल हैं। हालांकि, यदि क्षेत्रफल (सतही क्षेत्र) के दृष्टिकोण से देखा जाए, तो दुनिया में सबसे बड़ा आर्द्रभूमि क्षेत्र बोलीविया के पास है, जिसका क्षेत्रफल लगभग 1,48,000 वर्ग किलोमीटर है।
🦅 रामसर स्थल: टॉप सर्च किए जाने वाले प्रश्न (Q6 से Q10)
बुनियादी अवधारणाएं, चयन के कड़े मानदंड और भारतीय रामसर स्थलों से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
रामसर अभिसमय का मूल उद्देश्य दुनिया भर में आर्द्रभूमियों के नुकसान को रोकना और उनका संरक्षण करना है। इसका मुख्य मंत्र है "बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग" (Wise Use)। इसका अर्थ यह है कि स्थानीय समुदायों की आजीविका और आवश्यकताओं को प्रभावित किए बिना, इन पारिस्थितिक तंत्रों को इस तरह प्रबंधित किया जाए कि इनकी प्राकृतिक एवं जैविक क्षमताएं भविष्य के लिए भी सुरक्षित बनी रहें।
सरल शब्दों में, जल और थल के बीच के संक्रमणकालीन क्षेत्र (Transitional Zone) को आर्द्रभूमि या दलदली भूमि कहा जाता है, जहाँ की मिट्टी साल भर या किसी विशेष मौसम में पूरी तरह पानी से संतृप्त (Saturated) या डूबी रहती है। इसके अंतर्गत दलदल, नदियां, झीलें, लैगून, मैंग्रोव, प्रवाल भित्तियाँ (Coral Reefs) और यहाँ तक कि मानव निर्मित धान के खेत या जल संचयन क्षेत्र भी आते हैं। रामसर संधि के अनुसार, कम ज्वार (Low Tide) के समय समुद्री जल की गहराई 6 मीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए।
किसी भी आर्द्रभूमि को रामसर सूची में शामिल करने के लिए कुल 9 कड़े वैज्ञानिक मानदंड निर्धारित किए गए हैं। इनमें से किसी एक को भी पूरा करना अनिवार्य है। मुख्य मानदंडों में शामिल हैं: वह स्थल अद्वितीय या दुर्लभ प्राकृतिक आर्द्रभूमि का उदाहरण हो, वहां लुप्तप्राय (Endangered) प्रजातियां निवास करती हों, वह जैव-विविधता को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण हो, या फिर वहां नियमित रूप से 20,000 या उससे अधिक जलपक्षी (Waterbirds) आश्रय लेते हों।
भारत ने जब 1982 में इस संधि को आधिकारिक रूप से अपनाया, तब देश के दो ऐतिहासिक स्थलों को एक साथ सबसे पहले रामसर सूची में नामांकित किया गया था। ये स्थल हैं—ओडिशा में स्थित प्रसिद्ध खारे पानी की लैगून झील 'चिल्का झील' (Chilika Lake) और राजस्थान के भरतपुर में स्थित 'केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान' (Keoladeo National Park)। इन दोनों को अक्टूबर 1981 में ही यह विशिष्ट अंतर्राष्ट्रीय दर्जा मिल गया था।
क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से पश्चिम बंगाल में स्थित सुंदरवन डेल्टा (Sundarbans Wetland) भारत का सबसे बड़ा रामसर स्थल है, जो लगभग 4,230 वर्ग किलोमीटर के विशाल मैंग्रोव और जलीय क्षेत्र में फैला हुआ है। वहीं दूसरी ओर, हिमाचल प्रदेश में स्थित रेणुका आर्द्रभूमि (Renuka Wetland) भारत का सबसे छोटा रामसर स्थल है, जिसका कुल क्षेत्रफल मात्र 0.2 वर्ग किलोमीटर (लगभग 20 हेक्टेयर) है।
🦅 रामसर स्थल: यूपीएससी-ओरिएंटेड टॉप सर्च (Q11 से Q15)
मुख्य परीक्षा (Mains) के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणात्मक और विश्लेषणात्मक प्रश्नोत्तर
रामसर स्थल और जैव विविधता एक-दूसरे के पूरक हैं। ये स्थल पृथ्वी के सबसे समृद्ध पारिस्थितिक तंत्रों में से हैं, जो दुनिया की कुल प्रजातियों के एक बहुत बड़े हिस्से को जीवन आधार प्रदान करते हैं। रामसर टैग मिलने से इन क्षेत्रों को अंतर्राष्ट्रीय कानूनी संरक्षण प्राप्त होता है, जिससे संकटग्रस्त, स्थानिक (Endemic) और प्रवासी प्रजातियों (Migratory Birds) के प्राकृतिक आवासों का शिकार, अतिक्रमण और प्रदूषण से बचाव सुनिश्चित होता है।
आर्द्रभूमियाँ जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध एक प्राकृतिक ढाल (Natural Buffer) का कार्य करती हैं। अत्यधिक वर्षा के समय ये बाढ़ के पानी को सोखकर 'स्पंज' की तरह काम करती हैं, जिससे तटीय और शहरी क्षेत्रों में तबाही रुकती है। सूखे के दौरान ये भूजल स्तर (Groundwater Table) को रीचार्ज कर जल संकट को कम करती हैं। इसके अतिरिक्त, मैंग्रोव जैसी आर्द्रभूमियाँ समुद्री चक्रवातों और तीव्र लहरों के वेग को धीमा करके तटों की रक्षा करती हैं।
यद्यपि आर्द्रभूमियाँ पृथ्वी के कुल भूभाग का मात्र 6-9% हिस्सा हैं, लेकिन ये दुनिया के संपूर्ण स्थलीय कार्बन का लगभग 30% अपने भीतर संचित रखती हैं। इन्हें अत्यधिक प्रभावी 'ब्लू कार्बन सिंक' (Blue Carbon Sink) कहा जाता है। ये वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर उसे अपनी सघन वनस्पतियों और जलीय मिट्टी में सहस्राब्दियों तक दबाए रखती हैं। यदि इन्हें नष्ट किया जाए, तो यह संचित कार्बन पुनः वायुमंडल में मुक्त होकर ग्लोबल वार्मिंग को कई गुना बढ़ा सकता है।
रामसर स्थल केवल पारिस्थितिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी अत्यधिक उत्पादक होते हैं। ये करोड़ों स्थानीय लोगों को मत्स्य पालन, कृषि (जैसे मखाना और धान की खेती), जलकृषि, और नौकायन के माध्यम से प्रत्यक्ष रोजगार प्रदान करते हैं। इसके अलावा, अपनी प्राकृतिक सुंदरता और दुर्लभ पक्षियों के कारण ये स्थल पर्यावरण-पर्यटन (Eco-Tourism) के बड़े केंद्र बनते हैं, जिससे स्थानीय हस्तशिल्प, होटल और परिवहन उद्योगों को भारी आर्थिक लाभ पहुँचता है।
आर्द्रभूमियों का संरक्षण संयुक्त राष्ट्र के कई सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को प्राप्त करने के लिए अनिवार्य है। यह सीधे तौर पर SDG 6 (स्वच्छ जल और स्वच्छता), SDG 13 (जलवायु कार्रवाई), SDG 14 (जलीय जीवों की सुरक्षा), और SDG 15 (भूमि पर जीवन की सुरक्षा) से जुड़ा हुआ है। इसके अतिरिक्त, आजीविका सुरक्षा के माध्यम से यह अप्रत्यक्ष रूप से SDG 1 (गरीबी उन्मूलन) और SDG 2 (भूख की समाप्ति) में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।
🗺️ रामसर स्थल: मैप-बेस्ड और भौगोलिक खोजें (Q16 से Q20)
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) मैपिंग और मुख्य भारतीय आर्द्रभूमियों की भौगोलिक विशेषताओं पर आधारित प्रश्नोत्तर
भारत के 100 रामसर स्थलों में से भौगोलिक रूप से सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थल निम्नलिखित हैं: उत्तर में वूलर झील और तसो मोरीरी (जम्मू-कश्मीर/लद्दाख); पूर्व में चिल्का झील (ओडिशा) और लोकटक झील (मणिपुर); पश्चिम में नलसरोवर पक्षी अभयारण्य (गुजरात) और सांभर झील (राजस्थान); दक्षिण में वेम्बनाड-कोल आर्द्रभूमि (केरल) और मध्य भारत में भोज आर्द्रभूमि (मध्य प्रदेश)। ये सभी स्थल अपनी अनूठी भौगोलिक अवस्थिति के कारण अक्सर मैपिंग प्रश्नों का हिस्सा बनते हैं।
भारत में सर्वाधिक रामसर स्थलों की सूची में पहले स्थान पर तमिलनाडु है, जहाँ सबसे अधिक रामसर स्थल घोषित हैं। इसके बाद दूसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश आता है। इन राज्यों में तटीय पारिस्थितिक तंत्र, पक्षी अभयारण्यों और मानव निर्मित जलाशयों की अधिकता होने के कारण इन्हें वैश्विक स्तर पर बड़ी पहचान मिली है।
ओडिशा की चिल्का झील भारत की सबसे बड़ी और दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी खारे पानी की तटीय लैगून (Lagoon) झील है। यह भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवासी पक्षियों (Migratory Birds) के आगमन के लिए सबसे बड़ा शीतकालीन आश्रय स्थल है। इसके अतिरिक्त, यह लुप्तप्राय इरावदी डॉल्फिन (Irrawaddy Dolphins) के निवास स्थान के रूप में वैश्विक स्तर पर अत्यधिक प्रसिद्ध है। यह भारत की पहली आर्द्रभूमि थी जिसे रामसर सूची में शामिल किया गया था।
मणिपुर में स्थित लोकटक झील पूर्वोत्तर भारत की मीठे पानी की सबसे बड़ी झील है। यह अपनी सतह पर तैरते हुए सड़े-गले पौधों और मिट्टी के द्वीपों के लिए प्रसिद्ध है, जिन्हें स्थानीय भाषा में 'फुमदी' (Phumdis) कहा जाता है। इसी फुमदी के ऊपर दुनिया का एकमात्र तैरता हुआ राष्ट्रीय उद्यान 'केबुल लामजाओ राष्ट्रीय उद्यान' (Keibul Lamjao National Park) स्थित है, जो अत्यंत संकटग्रस्त और मणिपुर के राज्य पशु 'संगाई हिरण' (Sangai / Dancing Deer) का अंतिम प्राकृतिक आवास है। यह स्थल रामसर की 'मॉन्ट्रो रिकॉर्ड' (Montreux Record) सूची में भी शामिल है।
जम्मू-कश्मीर के बांदीपोरा जिले में स्थित वूलर झील भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी की प्राकृतिक झीलों (Freshwater Lakes) में से एक है। इस झील का निर्माण विवर्तनिक गतिविधि (Tectonic Activity) के कारण हुआ है और इसे झेलम नदी जल प्रदान करती है। यह पूरी घाटी के लिए एक विशाल प्राकृतिक बाढ़ नियंत्रण बेसिन के रूप में कार्य करती है और स्थानीय मछली उद्योग तथा हजारों प्रवासी पक्षियों के जीवन चक्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हाइड्रोलॉजिकल सिस्टम है।
🔥 रामसर स्थल: करंट अफेयर्स एंगल (Q21 से Q25)
हालिया घटनाक्रम, पर्यावरण कानून, चुनौतियाँ और समसामयिक परीक्षाओं के लिए सबसे प्रासंगिक प्रश्नोत्तर
भारत में रामसर स्थलों की संख्या का 100 के ऐतिहासिक मील के पत्थर तक पहुँचना वैश्विक पर्यावरण कूटनीति और घरेलू संरक्षण प्रयासों की एक महान सफलता है। इसका महत्व यह है कि अब देश का एक विशाल भौगोलिक और जलीय क्षेत्र अंतर्राष्ट्रीय संरक्षण मानकों के दायरे में आ गया है। यह वैश्विक मंच पर 'अमृत धरोहर' जैसी पहलों के माध्यम से सस्टेनेबल डेवलपमेंट और जैव-विविधता संरक्षण के प्रति भारत की मजबूत राजनीतिक और वैज्ञानिक इच्छाशक्ति को प्रमाणित करता है।
भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के निरंतर प्रयासों से हाल के वर्षों और महीनों में देश के विभिन्न राज्यों से कई महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियों को रामसर सूची में जोड़ा गया है, जिससे यह कुल आंकड़ा 100 तक पहुँच सका है। इन नए स्थलों में तटीय एस्ट्युअरी, बर्ड सेंचुरी और मानव निर्मित रिज़र्व शामिल हैं। परीक्षा के दृष्टिकोण से, नवीनतम अधिसूचित किए गए 4-5 स्थलों के नाम, उनके संबंधित जिले और उनकी मुख्य जैविक विशेषताओं को हमेशा समसामयिक घटनाक्रम (Current Affairs) से अपडेट करते रहना चाहिए।
रामसर टैग मिलने से किसी भी आर्द्रभूमि को कई महत्वपूर्ण लाभ प्राप्त होते हैं:
- अंतर्राष्ट्रीय पहचान: उस स्थल को वैश्विक मानचित्र पर स्थान मिलता है, जिससे शोध और वैश्विक सहयोग बढ़ता है।
- वित्तीय एवं तकनीकी सहायता: रामसर कन्वेंशन के सचिवालय और संबंधित वैश्विक संस्थाओं से संरक्षण के लिए फंड और अत्याधुनिक तकनीक मिलने की राह आसान हो जाती है।
- कड़ा कानूनी संरक्षण: राष्ट्रीय स्तर पर उस क्षेत्र में अवैध निर्माण, प्रदूषण फैलाने और अतिक्रमण करने पर सख्त प्रतिबंध लागू हो जाते हैं।
- ईको-टूरिज्म का विकास: राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनने से स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं।
हाँ, रामसर टैग मिलना संरक्षण की गारंटी नहीं है, बल्कि यह एक जिम्मेदारी है। आज भी कई रामसर स्थल अनियंत्रित शहरीकरण, औद्योगिक कचरे के बहाव, कृषि रसायनों के कारण होने वाले यूट्रोफिकेशन (Eutrophication), और विदेशी आक्रामक प्रजातियों (जैसे जलकुंभी) के प्रसार से गंभीर रूप से संकटग्रस्त हैं। यदि किसी रामसर स्थल के पारिस्थितिक स्वरूप में मानवीय हस्तक्षेप के कारण गंभीर गिरावट आती है, तो उसे 'मॉन्ट्रो रिकॉर्ड' (Montreux Record) में डाल दिया जाता है, जो एक प्रकार का वैश्विक 'रेड अलर्ट' है (जैसे भारत की केवलादेव और लोकटक झील इसमें शामिल हैं)।
आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 भारत में आर्द्रभूमियों के विनियामक ढांचे को मजबूत करने के लिए बनाए गए हैं। इसकी मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:
- इसके तहत प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में 'राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण' (State Wetland Authority) की स्थापना की गई है, जिससे विकेंद्रीकृत प्रबंधन को बढ़ावा मिला है।
- यह नियम आर्द्रभूमि क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के स्थायी निर्माण, उद्योगों की स्थापना, कचरा डंप करने और विषाक्त पदार्थों के विसर्जन को पूरी तरह प्रतिबंधित (Prohibited) करता है।
- यह 'बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग' (Wise Use) के सिद्धांत पर आधारित है, ताकि पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय समुदायों की आजीविका भी सुचारू रूप से चलती रहे।
📊 भारत के 100 रामसर स्थल: राज्यवार संख्या और संपूर्ण सूची
प्रत्येक राज्य में मौजूद रामसर स्थलों की सटीक संख्या और उनके नाम की विस्तृत तालिका
कारीकिली पक्षी अभयारण्य, पल्लीकरनई मार्श रिजर्व फॉरेस्ट, पिचवरम मैंग्रोव, पल्लीकरनई, कुंतकुलम पक्षी अभयारण्य, मन्नार की खाड़ी समुद्री बायोस्फीयर रिजर्व, वेम्बनूर आर्द्रभूमि परिसर, वेल्लोड पक्षी अभयारण्य, वेदानथंगल पक्षी अभयारण्य, उदयमार्थन्दपुरम पक्षी अभयारण्य, चित्रंगुड़ी पक्षी अभयारण्य, सुचिन्द्रम थेरूर आर्द्रभूमि परिसर, वडुवुर पक्षी अभयारण्य, कांजिरकुलम पक्षी अभयारण्य, पॉइंट कैलिमेर वन्यजीव और पक्षी अभयारण्य।
ऊपरी गंगा नदी (बृजघाट से नरोरा खिंचाव), नवाबगंज पक्षी अभयारण्य, सांडी पक्षी अभयारण्य, समसपुर पक्षी अभयारण्य, समन पक्षी अभयारण्य, पार्वती अरगा पक्षी अभयारण्य, सरसई नावर झील, सूर सरोवर (कीथम झील), हैदरपुर आर्द्रभूमि, बखिरा वन्यजीव अभयारण्य।
चिल्का झील, भीतरकनिका मैंग्रोव, सतकोसिया गॉर्ज, टाम्पारा झील, हीराकुंड जलाशय, अनसुपा झील।
हरिके आर्द्रभूमि, कांजली आर्द्रभूमि, रोपड़ आर्द्रभूमि, केशोपुर-मियानी कम्युनिटी रिजर्व, ब्यास संरक्षण रिजर्व, नांगल वन्यजीव अभयारण्य।
वूलर झील, होकेरा आर्द्रभूमि, सुरिंसर-मानसर झीलें, हायगम आर्द्रभूमि संरक्षण रिजर्व, शालबुग आर्द्रभूमि संरक्षण रिजर्व।
भोज आर्द्रभूमि, सांख्य सागर, सिरपुर आर्द्रभूमि, यशवंत सागर।
नलसरोवर पक्षी अभयारण्य, thol झील वन्यजीव अभयारण्य, वधवाना आर्द्रभूमि, खिजड़िया वन्यजीव अभयारण्य।
पोंग बांध झील, चन्द्राताल आर्द्रभूमि, रेणुका आर्द्रभूमि (भारत का सबसे छोटा रामसर क्षेत्र)।
अष्टमुडी आर्द्रभूमि, सस्थमकोट्टा झील, वेम्बनाड-कोल आर्द्रभूमि।
नंदूर मदमेश्वर, लोनार झील, ठाणे क्रीक।
राजस्थान (2): केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, सांभर झील।
हरियाणा (2): सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान, भिंडावास वन्यजीव अभयारण्य।
लद्दाख (2): तसो मोरीरी, त्सो कर आर्द्रभूमि परिसर।
पश्चिम बंगाल (2-सुंदरवन, पूर्वी कोलकाता), असम (1-दीपोर बील), त्रिपुरा (1-रुद्रसागर झील), मणिपुर (1-लोकटक झील), आंध्र प्रदेश (1-कोल्लेरू झील), बिहार (1-कावरताल), गोवा (1-नंदा झील), मिजोरम (1-पाला आर्द्रभूमि), उत्तराखंड (1-आसन कंजर्वेशन)।
इस गाइड में UPSC और BPSC परीक्षाओं के लिए कस्टमाइज्ड कोर कॉन्सेप्ट्स और डीप एनालिसिस दिया गया है।

